बिहार में उच्च शिक्षा के लिए यूनिवर्सिटी की संख्या बहुत कम है। एक नई यूनिवर्सिटी खोलने के लिए भी लोगों को नेताओं के आगे मिन्नतें करनी पड़ती हैं। फाइलें सालों तक अटकी रहती हैं और राजनीतिक सहमति के बिना काम आगे नहीं बढ़ता।
यूनिवर्सिटी की कमी का सीधा असर बिहार के छात्रों पर पड़ता है। लाखों बच्चे हर साल दिल्ली पंजाब हरियाणा महाराष्ट्र और दक्षिण भारत में पढ़ने जाते हैं। इससे परिवार पर आर्थिक बोझ पड़ता है और राज्य की प्रतिभा बाहर चली जाती है।
बिहार की आबादी के हिसाब से केंद्रीय और राज्य यूनिवर्सिटी की संख्या बहुत कम है। कई जिलों में कोई बड़ा शिक्षण संस्थान नहीं है। प्रोफेशनल कोर्स रिसर्च और रोजगारपरक शिक्षा की सुविधा भी सीमित है।
शिक्षाविद कहते हैं कि नई यूनिवर्सिटी की मंजूरी प्रक्रिया को आसान करना होगा। बजट आवंटन और राजनीतिक इच्छाशक्ति दोनों जरूरी हैं। अगर बिहार में ही अच्छे संस्थान बनेंगे तो छात्रों का पलायन रुकेगा और राज्य का विकास होगा।
सरकार ने कुछ नए संस्थानों की घोषणा जरूर की है। लेकिन जमीन और फंड की दिक्कत से काम धीमा चल रहा है।
जब तक बिहार में गुणवत्तापूर्ण उच्च शिक्षा के केंद्र नहीं बनेंगे तब तक युवा दूसरे राज्यों की ओर जाते रहेंगे। शिक्षा को राजनीति से ऊपर रखकर फैसले लेने की जरूरत है।
न्यूज बाय
Sabiha khan
