News by Azam lala✍️✍️
वीआईपी रोड पर एक बार फिर एक युवक जिंदगी से हारकर मौत को गले लगाने चला था।
घरेलू परेशानियाँ, आर्थिक तंगी और अंदर ही अंदर टूटता हुआ इंसान…
इन सबने मिलकर उसे इस मोड़ पर ला खड़ा किया जहाँ उसे पानी की गहराई, जिंदगी से आसान लगने लगी।
मगर कहते हैं —
“जिसे रखे मालिक, उसे मिटा सके ना कोई…”
सूचना मिलते ही नगर निगम फायर ब्रिगेड की गोताखोर टीम मौके पर पहुँची और मौत के मुहाने पर खड़े युवक को सुरक्षित बाहर निकाल लिया।
तलैया थाना पुलिस को सौंपे गए युवक की पहचान जंगीराबाद चार बत्ती निवासी के रूप में हुई।
इस रेस्क्यू में फैजुल्लाह, मोहम्मद इमरान, ओम प्रकाश बाथम और शेख आसिफ जैसे असली हीरो मौजूद रहे, जिन्होंने एक बुझती हुई जिंदगी को फिर से सांसें दे दीं।
मगर सवाल सिर्फ़ एक युवक का नहीं है…
सवाल उस खामोश दर्द का है जो भोपाल के हजारों घरों में पल रहा है।
आज हर दूसरी घटना के पीछे एक ही लफ्ज़ सुनाई देता है — “डिप्रेशन”।
मगर डिप्रेशन सिर्फ़ किताबों का शब्द नहीं,
ये वो दर्द है जो बेरोज़गारी, महंगाई, कर्ज़, नशे की लत और जिम्मेदारियों के बोझ तले धीरे-धीरे इंसान को अंदर से खत्म कर देता है।
कुछ लोग नशे में सुकून ढूंढते हैं,
फिर वही नशा उन्हें आर्थिक तंगी में धकेल देता है, कुछ लोग प्यार में धोखा खा जाते है
और आखिर में जिंदगी इतनी भारी लगने लगती है कि बड़ा तालाब उन्हें मौत का आसान रास्ता नज़र आने लगता है।
ये सिर्फ़ प्रशासन की नहीं, पूरे समाज की जिम्मेदारी है।
अगर मोहल्लों में रहने वाले लोग अपने आसपास आर्थिक तंगी से गुजर रहे परिवारों का हाथ थाम लें,
अगर कोई तंजीम, कोई संगठन सिर्फ़ ऐसे टूटे हुए लोगों के लिए खड़ा हो जाए,
तो शायद कई लोग मौत से पहले मदद तक पहुँच सकें।
आज जरूरत सिर्फ़ रेस्क्यू टीम की नहीं…
बल्कि ऐसे हाथों की है जो किसी को तालाब तक पहुँचने से पहले रोक लें।
“लोग अक्सर डूबते पानी में नहीं,
बल्कि हालात की गहराई में हैं…”
अगर आप या आपका कोई जानने वाला भावनात्मक संकट में है, तो किसी भरोसेमंद व्यक्ति, परिवार, दोस्त या मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञ से बात करना मददगार हो सकता है। भारत में तत्काल सहायता के लिए हेल्पलाइन सेवाएँ भी उपलब्ध हैं।
