मध्य प्रदेश प्रशासन में सामने आया एक महिला डीएसपी की हाइट को लेकर विवाद कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यदि अभिलेखों में दर्ज हाइट 153 से.मी. थी और चयन प्रक्रिया में यह 155 से.मी. मान ली गई, तो यह केवल एक मामूली त्रुटि नहीं बल्कि पूरी चयन प्रणाली की विश्वसनीयता पर प्रश्नचिन्ह है।
पुलिस भर्ती जैसी संवेदनशील प्रक्रिया में शारीरिक मापदंडों का विशेष महत्व होता है। ऐसे में दो सेंटीमीटर का अंतर भी चयन या अयोग्यता तय कर सकता है। यही वजह है कि हाइट, चेस्ट और अन्य फिजिकल पैरामीटर को लेकर सख्त और पारदर्शी प्रक्रिया अपनाई जाती है। अगर इस स्तर पर गड़बड़ी सामने आती है, तो यह संकेत है कि या तो माप प्रक्रिया में लापरवाही हुई या फिर जानबूझकर नियमों को दरकिनार किया गया।
इस मामले में सबसे बड़ा सवाल मध्य प्रदेश लोक सेवा आयोग (MPPSC) की कार्यप्रणाली पर उठता है। क्या माप के दौरान उपकरणों में त्रुटि थी? क्या मेडिकल बोर्ड ने सही तरीके से सत्यापन नहीं किया? या फिर किसी स्तर पर प्रभाव, दबाव या मिलीभगत ने नियमों को कमजोर कर दिया?
यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि हाइट का अंतिम सत्यापन किस स्तर पर हुआ और क्या उस प्रक्रिया में क्रॉस-चेकिंग का कोई मजबूत सिस्टम मौजूद था। यदि नहीं, तो यह प्रशासनिक ढांचे की एक गंभीर कमजोरी है, जिसे तुरंत सुधारने की आवश्यकता है।
इस तरह के मामलों में केवल संबंधित उम्मीदवार को दोषी ठहराना पर्याप्त नहीं होगा। जिम्मेदारी उन अधिकारियों और कर्मचारियों की भी तय होनी चाहिए, जिन्होंने माप प्रक्रिया को पूरा किया और दस्तावेजों को प्रमाणित किया। यदि किसी स्तर पर जानबूझकर हेराफेरी की गई है, तो संबंधित लोगों पर कठोर कार्रवाई अनिवार्य है, ताकि भविष्य में ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति न हो।
साथ ही, यह मामला व्यापक सुधार की मांग करता है—
भर्ती प्रक्रियाओं में डिजिटल मापन तकनीक, वीडियो रिकॉर्डिंग और थर्ड-पार्टी ऑडिट जैसे उपाय लागू किए जाने चाहिए, ताकि पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
अंततः, यह केवल एक व्यक्ति या एक पद का मामला नहीं है, बल्कि पूरे सिस्टम की साख का प्रश्न है। अगर ऐसी लापरवाहियां अनदेखी की जाती रहीं, तो योग्य उम्मीदवारों का विश्वास डगमगा सकता है और प्रशासनिक ढांचे की निष्पक्षता पर स्थायी आंच आ सकती है।
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Azam lala
