PM Narendra Modi इंस्टाग्राम पर 10 करोड़ फॉलोअर्स के साथ वर्ल्ड लीडर बने, यात्रा 2014 में हुई शुरू
देश में बढ़ती महंगाई, कमजोर होते रुपये और विदेशी आयात पर बढ़ती निर्भरता के बीच अब “डॉलर बचाओ आंदोलन” जैसी सोच चर्चा में आने लगी है। इस विचार का मूल संदेश यह है कि यदि भारत को आर्थिक रूप से मजबूत बनाना है, तो विदेशी मुद्रा भंडार को बचाना और अनावश्यक आयात कम करना बेहद जरूरी है। इसके लिए सबसे बड़ी भूमिका देश के मिडल क्लास की मानी जा रही है, क्योंकि उपभोग और खर्च का बड़ा हिस्सा इसी वर्ग से आता है। अपील की जा रही है कि लोग एक साल तक विदेश यात्राएं टालें, पेट्रोल-डीजल की खपत कम करें और सोने की खरीदारी में संयम बरतें।
विश्लेषकों के अनुसार भारत अपनी जरूरत का लगभग 85 प्रतिशत कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है, जबकि सोने की मांग का बड़ा हिस्सा भी इम्पोर्ट के जरिए पूरा होता है। इन दोनों क्षेत्रों में भारी मात्रा में डॉलर खर्च होता है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की कीमतें बढ़ती हैं या डॉलर महंगा होता है, तो उसका सीधा असर भारतीय अर्थव्यवस्था और आम लोगों की जेब पर पड़ता है। पेट्रोल-डीजल महंगा होने से ट्रांसपोर्ट लागत बढ़ती है और फिर खाने-पीने से लेकर रोजमर्रा की हर चीज महंगी होने लगती है। इसी तरह सोने के भारी आयात से भी विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव बढ़ता है।
इस बहस में देश के औद्योगिक विकास और पर्यावरण विवादों का मुद्दा भी सामने लाया जा रहा है। उदाहरण के तौर पर तमिलनाडु स्थित स्टरलाइट कॉपर प्लांट का जिक्र किया जा रहा है, जिसे विरोध प्रदर्शनों और पर्यावरणीय विवादों के बाद बंद कर दिया गया था। समर्थकों का तर्क है कि इसके बंद होने के बाद भारत को बड़ी मात्रा में तांबा विदेशों से आयात करना पड़ रहा है, जिससे अरबों डॉलर का अतिरिक्त बोझ बढ़ा। उनका कहना है कि यदि देश में उद्योग और उत्पादन बढ़ेंगे तो आयात पर निर्भरता घटेगी और रोजगार भी बढ़ेंगे। हालांकि दूसरी ओर पर्यावरण और स्वास्थ्य सुरक्षा को लेकर उठने वाले सवालों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।
“डॉलर बचाओ आंदोलन” का संदेश मूल रूप से संयम और आर्थिक राष्ट्रवाद पर आधारित बताया जा रहा है। इसमें लोगों से अपील की जा रही है कि दिखावे की खपत कम करें, जरूरत के अनुसार ईंधन इस्तेमाल करें और घरेलू उत्पादों को प्राथमिकता दें। समर्थकों का मानना है कि यदि देश बड़े पैमाने पर आयात कम करने में सफल होता है तो रुपये की स्थिति मजबूत होगी, विदेशी मुद्रा भंडार पर दबाव घटेगा और महंगाई को नियंत्रित करने में मदद मिल सकती है। हालांकि अर्थशास्त्रियों का कहना है कि महंगाई और मुद्रा विनिमय दर कई वैश्विक और घरेलू कारकों पर निर्भर करती है, इसलिए केवल उपभोग कम करना ही इसका पूर्ण समाधान नहीं माना जा सकता।
न्यूज़ बाय : साबिहा खान
