संवाददाता : Azam lala
सरकारी योजनाओं की असली तस्वीर अक्सर फाइलों में नहीं, गांव की पगडंडियों पर दिखाई देती है। गुरुवार को भोपाल कमिश्नर संजीव सिंह का बैरसिया दौरा भी कुछ ऐसा ही संदेश देता नजर आया। यह महज एक प्रशासनिक निरीक्षण नहीं था, बल्कि उन योजनाओं का जमीनी परीक्षण था जिन्हें सरकार ग्रामीण आत्मनिर्भरता का नया चेहरा बताती है।
बैरसिया के गांवों में पहुंचकर कमिश्नर ने महिला स्व-सहायता समूहों, प्राकृतिक खेती, खेत तालाबों और गोशालाओं से जुड़े कार्यों का जायजा लिया। खास बात यह रही कि उन्होंने केवल परियोजनाएं नहीं देखीं, बल्कि उन महिलाओं से भी संवाद किया जो इन योजनाओं का चेहरा बन चुकी हैं।

सरकारी योजना से ‘ग्रामीण स्टार्टअप’ तक का सफर
ग्रामीण आजीविका मिशन के तहत काम कर रहे महिला समूह अब सिर्फ बचत और ऋण तक सीमित नहीं हैं। कई गांवों में ये समूह छोटे उद्योग, हस्तशिल्प, कृषि उत्पाद और स्वरोजगार के नए मॉडल खड़े कर रहे हैं।
कमिश्नर ने गोलखेड़ी के जरी-जरदोजी प्रशिक्षण केंद्र का निरीक्षण कर यह समझने की कोशिश की कि सरकारी सहायता वास्तव में महिलाओं की आर्थिक स्थिति बदल रही है या नहीं।

खेती की बदलती तस्वीर पर फोकस
दौरे का दूसरा बड़ा केंद्र प्राकृतिक और जैविक खेती रही। रासायनिक खेती की बढ़ती लागत और घटते मुनाफे के बीच सरकार प्राकृतिक खेती को विकल्प के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
खेत तालाब, पशुपालन और जैविक खेती को जोड़कर ऐसा मॉडल विकसित करने की कोशिश हो रही है, जिसमें किसान बाजार पर कम और अपने संसाधनों पर ज्यादा निर्भर रहे |

