कोलकाता में अमित शाह का बड़ा दावा, पहले चरण में 110 सीटें जीतने का भरोसा
सत्ता का ‘प्रचंड’ अहंकार और खामोशी की रणनीति
अमित शाह का बंगाल में “प्रचंड बहुमत” का दावा कोई नई बात नहीं है; यह उस चुनावी मशीनरी का हिस्सा है जो हार में भी जीत का उत्सव मनाना जानती है। 2021 के “अबकी बार 200 पार” के नारे की हकीकत सबने देखी थी, लेकिन दिल्ली के गलियारों में बैठे चाणक्यों के लिए ‘अहंकार’ एक ऐसा आभूषण है जिसे वे उतारना नहीं चाहते।
- दावों का भूगोल और हकीकत का इतिहास :
बंगाल की धरती पर पैर रखते ही बीजेपी के नेता अक्सर जमीनी हकीकत से ज्यादा ‘नंबरों’ के खेल में खो जाते हैं। 152 में से 110 सीटें जीतने का दावा सुनकर ऐसा लगता है जैसे ईवीएम का रिमोट कंट्रोल सांख्यिकी विभाग के पास नहीं, बल्कि बीजेपी के मुख्यालय में है। यह वही आत्मविश्वास है जो बंगाल की ‘दीदी’ को चुनौती तो देता है, लेकिन अक्सर खुद ही ‘ओह-नो’ की स्थिति में फंस जाता है। - मणिपुर: जहाँ ‘प्रचंड’ आवाज ‘मौन’ में बदल जाती है :
सबसे तीखा तंज तो बीजेपी की प्राथमिकता पर है। एक तरफ बंगाल की सत्ता हथियाने के लिए शाह के पास शब्दों का अंबार है, रैलियों का सैलाब है और दावों की आतिशबाजी है। लेकिन दूसरी तरफ मणिपुर है—एक ऐसा राज्य जो महीनों से जल रहा है, जहाँ की बेटियां न्याय मांग रही हैं और जहाँ की हवाओं में बारूद की गंध है।
चुनावी पर्यटन बनाम संवैधानिक जिम्मेदारी: बंगाल में “ममता के शासन” पर दहाड़ने वाले नेताओं की आवाज मणिपुर के नाम पर अचानक क्यों बैठ जाती है?
दोहरा मापदंड: बीजेपी का राष्ट्रवाद शायद सिर्फ वहीं जागता है जहाँ ‘वोट’ की फसल लहलहा रही हो। मणिपुर में डबल इंजन की सरकार का इंजन फेल नजर आता है, लेकिन बंगाल में तीसरी बार इंजन बदलने का दावा “अहंकार” की पराकाष्ठा है। - “बंगाली मुख्यमंत्री” और बाहरी का टैग :
यह दावा कि मुख्यमंत्री “बंगाल की धरती” से होगा, खुद में एक स्वीकारोक्ति है कि जनता उन्हें अभी भी “बाहरी” मानती है। यह उस पार्टी का विरोधाभास है जो एक तरफ ‘एक देश, एक चुनाव’ की बात करती है, लेकिन वोट के लिए क्षेत्रीय पहचान का चोला ओढ़ने को मजबूर है।
निष्कर्ष: भरोसे की कमी या सत्ता का नशा?
अमित शाह जिसे “भय से भरोसे की यात्रा” कह रहे हैं, आलोचक उसे “भ्रम से अहंकार की यात्रा” देख रहे हैं। जब आप एक जलते हुए राज्य (मणिपुर) की चीखों को नजरअंदाज कर दूसरे राज्य में जश्न की तारीखें तय करते हैं, तो वह ‘आत्मविश्वास’ नहीं, बल्कि सत्ता का वह ‘अहंकार’ है जो अक्सर पतन की पहली सीढ़ी होता है।
