बाड़ी शराब दुकान से जुड़ी बताई जा रही बोलेरो में भरकर गांवों तक पहुंच रही शराब, वीडियो और तस्वीरों ने खोली सिस्टम की पोल, कार्रवाई के बजाय सिर्फ आश्वासन!
बाड़ी (रायसेन)। बाड़ी क्षेत्र में शराब कारोबार को लेकर सामने आए वीडियो और तस्वीरों ने पूरे आबकारी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। जिस विभाग पर अवैध शराब कारोबार रोकने की जिम्मेदारी है, उसी विभाग की नाक के नीचे कथित रूप से गांव-गांव शराब सप्लाई का खेल चल रहा है और जिम्मेदार अधिकारी कार्रवाई के बजाय जांच और आश्वासन का रटा-रटाया जवाब देते नजर आ रहे हैं।
आरोप है कि बाड़ी स्थित शराब दुकान से जुड़ी बताई जा रही बोलेरो वाहन क्रमांक MP04ZG1211 में शराब की पेटियां भरकर गांव-गांव पहुंचाई जा रही हैं। सामने आए वीडियो में वाहन शराब की पेटियों से ठसाठस भरा दिखाई देता है, वहीं कई स्थानों पर शराब उतारते हुए भी देखा जा सकता है। सवाल यह है कि आखिर शराब दुकान का लाइसेंस दुकान चलाने के लिए दिया गया है या फिर पूरे क्षेत्र में मोबाइल शराब वितरण केंद्र संचालित करने के लिए?
यदि गांव-गांव शराब पहुंचाना वैध है तो आबकारी विभाग जनता को नियम दिखाए। और यदि यह अवैध है तो फिर अब तक कार्रवाई क्यों नहीं हुई? क्या विभाग किसी बड़े संरक्षणदाता की भूमिका में है या फिर सब कुछ जानबूझकर नजरअंदाज किया जा रहा है?
क्या अब शराब खरीदने दुकान जाने की जरूरत खत्म?
जिस शराब को निर्धारित दुकान से बेचा जाना चाहिए, वह यदि सीधे गांवों तक पहुंचाई जा रही है तो यह केवल नियमों का प्रश्न नहीं बल्कि पूरे कानून के मजाक का मामला है। क्या अब गांवों को शराब कारोबार का नया बाजार बना दिया गया है? क्या अब शराब ठेकेदार घर-घर और गांव-गांव सप्लाई की सुविधा भी देने लगे हैं?
क्षेत्र के लोगों का कहना है कि यदि यही हाल रहा तो आने वाले समय में गांवों में राशन की दुकान से पहले शराब की उपलब्धता सुनिश्चित हो जाएगी। यह स्थिति न केवल कानून व्यवस्था बल्कि सामाजिक ताने-बाने के लिए भी गंभीर खतरा बन सकती है।
गांवों को नशे की मंडी बनाने की तैयारी?
जहां सरकार नशा मुक्ति और जनजागरण की बात करती है, वहीं गांवों तक शराब की आसान उपलब्धता युवा पीढ़ी को सीधे नशे की गिरफ्त में धकेल सकती है। गरीब परिवार, बेरोजगार युवा और ग्रामीण परिवेश पहले ही अनेक सामाजिक चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे में यदि शराब घरों के दरवाजे तक पहुंचने लगे तो इसके दुष्परिणामों की जिम्मेदारी कौन लेगा?
वीडियो सामने, वाहन नंबर सामने, शिकायतें सामने… फिर भी कार्रवाई गायब
पूरे मामले में सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कथित सप्लाई में उपयोग हो रहे वाहन के वीडियो सामने हैं, वाहन नंबर सामने है, शिकायतें सामने हैं और सवाल भी सार्वजनिक रूप से उठ रहे हैं, लेकिन कार्रवाई अभी तक दिखाई नहीं दे रही।
क्या विभाग को कार्रवाई के लिए और सबूत चाहिए? या फिर मामला ऐसे लोगों से जुड़ा है जिन पर हाथ डालने से अधिकारी बच रहे हैं?
अधिकारियों के जवाबों ने और बढ़ाए संदेह
जब पूरे मामले को लेकर बाड़ी-बरेली आबकारी वृत्त अधिकारी सुनील कुमार मीणा से चर्चा की गई तो उनका जवाब था—
“जांच करके सही पाया गया तो कार्रवाई करूंगा।”
वहीं जिला आबकारी अधिकारी दीपक अवस्थी ने कहा—
“मैं देखता हूं, कार्रवाई करता हूं।”
इन जवाबों ने लोगों के मन में एक और सवाल खड़ा कर दिया है। जब वीडियो सामने हैं, वाहन सामने है और आरोप सार्वजनिक हैं तो आखिर कार्रवाई पहले होगी या जांच के नाम पर मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा?
छोटे मामलों में सख्ती, बड़े मामलों में चुप्पी क्यों?
आबकारी विभाग अक्सर कुछ लीटर शराब जब्त कर प्रेस विज्ञप्ति जारी करता है और उसे बड़ी उपलब्धि बताता है। लेकिन जब सवाल कथित रूप से बड़े स्तर पर संचालित सप्लाई नेटवर्क का उठता है तो विभाग की सक्रियता अचानक धीमी क्यों पड़ जाती है?
यही कारण है कि अब क्षेत्र के लोग पूछ रहे हैं—
क्या कानून केवल गरीब और सामान्य लोगों के लिए है?
क्या बड़े ठेकेदारों और प्रभावशाली लोगों के लिए अलग नियम लागू हैं?
क्या विभाग कार्रवाई करता है या केवल दिखावटी अभियान चलाकर अपनी जिम्मेदारी पूरी मान लेता है?
ठेकेदार से सीधे सवाल
- क्या गांव-गांव शराब पहुंचाने की वैधानिक अनुमति प्राप्त है?
- यदि नहीं, तो वाहन में भरी शराब गांवों तक क्यों पहुंच रही थी?
- किन-किन गांवों और स्थानों पर शराब उतारी गई?
- क्या अनधिकृत स्थानों पर शराब का भंडारण किया जा रहा है?
- क्या शराब दुकान के नाम पर समानांतर बिक्री तंत्र संचालित किया जा रहा है?
अब जांच नहीं, जवाबदेही चाहिए – यह मामला केवल एक वाहन या कुछ शराब की पेटियों का नहीं है। यह पूरे आबकारी तंत्र की विश्वसनीयता, विभागीय निगरानी और शराब कारोबार की पारदर्शिता पर सीधा प्रश्नचिह्न है।
यदि आरोप गलत हैं तो विभाग तत्काल निष्पक्ष जांच कर सच्चाई सार्वजनिक करे।
लेकिन यदि आरोप सही हैं तो फिर केवल चालक या छोटे कर्मचारियों पर कार्रवाई नहीं, बल्कि पूरे कथित नेटवर्क और जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय होनी चाहिए।
क्या शराब ठेकेदार को केवल दुकान चलाने का लाइसेंस मिला है या गांव-गांव शराब पहुंचाकर बेचने का भी?
और यदि ऐसा कोई अधिकार नहीं है, तो फिर बाड़ी से गांवों तक पहुंच रही शराब आखिर किसके संरक्षण में पहुंच रही है?
