पश्चिम बंगाल में राजनीतिक हिंसा एक बार फिर राष्ट्रीय बहस का विषय बन गई है। All India Trinamool Congress (TMC) के कार्यकर्ताओं पर कथित हमलों और लगातार बढ़ती झड़पों के बीच अब विपक्ष केंद्र सरकार और केंद्रीय सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल उठा रहा है। सड़कों पर खुलेआम हो रही हिंसा, वायरल वीडियो और लगातार दर्ज हो रही शिकायतों ने कानून-व्यवस्था को लेकर गंभीर चिंता पैदा कर दी है।
विपक्ष का सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब देश में लगभग ढाई लाख से अधिक अर्धसैनिक बल मौजूद हैं, तब भी बंगाल में राजनीतिक हिंसा को रोकने में विफलता क्यों दिखाई दे रही है। आलोचकों का कहना है कि केंद्रीय गृह मंत्री Amit Shah की सुरक्षा व्यवस्था VVIP स्तर की है, लेकिन आम राजनीतिक कार्यकर्ता और नागरिक खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो में कथित तौर पर कार्यकर्ताओं पर हमले, मारपीट और आगजनी जैसी घटनाएं दिखाई दे रही हैं, जिससे राजनीतिक माहौल और अधिक तनावपूर्ण हो गया है।
TMC नेताओं का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों और अर्धसैनिक बलों का इस्तेमाल केवल चुनावी ड्यूटी, छापेमारी और राजनीतिक कार्रवाई तक सीमित होकर रह गया है। पार्टी का कहना है कि जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए कोई प्रभावी कदम नजर नहीं आ रहे। उनका आरोप है कि हिंसा की घटनाओं में FIR दर्ज होने के बावजूद कार्रवाई धीमी है और कई मामलों में आरोपी खुलेआम घूम रहे हैं।
दूसरी ओर केंद्र सरकार का तर्क है कि “लॉ एंड ऑर्डर” यानी कानून-व्यवस्था राज्य सरकार का विषय है। केंद्र का कहना है कि Central Reserve Police Force (CRPF) और Border Security Force (BSF) जैसी केंद्रीय सुरक्षा एजेंसियां केवल राज्य सरकार की मांग या विशेष परिस्थितियों में तैनात की जाती हैं। केंद्र के अनुसार यदि राज्य प्रशासन समय पर सहायता मांगता है, तो केंद्रीय बल सहयोग के लिए तैयार रहते हैं।
लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि यह मामला सिर्फ संवैधानिक जिम्मेदारी का नहीं, बल्कि प्रशासनिक इच्छाशक्ति और राजनीतिक समन्वय का भी है। जब हिंसा के वीडियो सार्वजनिक रूप से सामने आ रहे हों और घटनाएं कैमरे में रिकॉर्ड हो रही हों, तब केवल अधिकार क्षेत्र की बहस से स्थिति नहीं सुधर सकती। आम जनता के बीच यह सवाल गहराता जा रहा है कि यदि सुरक्षा बलों की मौजूदगी के बावजूद राजनीतिक हिंसा नहीं रुक पा रही, तो फिर इतनी बड़ी सुरक्षा व्यवस्था का वास्तविक उद्देश्य क्या है।
विशेषज्ञों का कहना है कि बंगाल में लंबे समय से चुनावी और राजनीतिक हिंसा की संस्कृति बनी हुई है, जिसमें सत्ता और विपक्ष दोनों एक-दूसरे पर आरोप लगाते रहे हैं। हर चुनाव के दौरान हिंसा, धमकी और टकराव की खबरें सामने आती हैं, लेकिन स्थायी समाधान अब तक नहीं निकल पाया। इसका सबसे बड़ा नुकसान आम कार्यकर्ताओं और स्थानीय नागरिकों को उठाना पड़ता है, जो राजनीतिक संघर्ष के बीच पिसते रहते हैं।
चुनावी माहौल के बीच बढ़ती हिंसा ने पूरे लोकतांत्रिक ढांचे पर सवाल खड़े कर दिए हैं। जनता पूछ रही है कि आखिर राजनीतिक दल कब तक एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालते रहेंगे? जब तक केंद्र और राज्य सरकारें राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर मिलकर कार्रवाई नहीं करेंगी, तब तक सड़क पर बहता खून और डर का माहौल खत्म होना मुश्किल दिखाई देता है।
आज स्थिति यह है कि “ढाई लाख केंद्रीय बल” का आंकड़ा लोगों के लिए सुरक्षा का भरोसा कम और राजनीतिक बहस का हिस्सा ज्यादा बनता जा रहा है। यदि समय रहते प्रभावी और निष्पक्ष कार्रवाई नहीं हुई, तो यह संकट केवल बंगाल तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश की लोकतांत्रिक व्यवस्था और जनता के भरोसे पर भी गहरा असर डाल सकता है।
न्यूज बाय: Sabiha Khan
