न्यूज बाय : सूरज मेहरा
सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण टिप्पणी में स्पष्ट किया है कि यदि कोई वयस्क महिला अपनी इच्छा और सहमति से किसी भी प्रकार के सेक्स वर्क से जुड़ी होती है, तो केवल इसी आधार पर उसे अपराधी नहीं माना जा सकता। अदालत ने कहा कि ऐसे मामलों में कानून प्रवर्तन एजेंसियों को अत्यंत संवेदनशीलता के साथ कार्य करना चाहिए और महिलाओं के मौलिक अधिकारों, गरिमा तथा सम्मान का पूरा ध्यान रखना आवश्यक है।
अदालत ने अपने अवलोकन में यह भी कहा कि पुलिस और प्रशासन को इस प्रकार के मामलों में बिना पूर्वाग्रह के कार्यवाही करनी चाहिए तथा यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी भी महिला के साथ अमानवीय व्यवहार या अनावश्यक उत्पीड़न न हो। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि वयस्कों के बीच सहमति से किए गए कार्य और जबरन कराए गए अपराधों के बीच अंतर को समझना आवश्यक है।
हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने यह भी दोहराया कि मानव तस्करी, नाबालिगों का शोषण, जबरन देह व्यापार या किसी भी प्रकार की मजबूरी से जुड़ी गतिविधियां पूरी तरह से अवैध और दंडनीय हैं। ऐसे मामलों में कानून अपने कठोर प्रावधानों के तहत कार्रवाई करेगा और किसी प्रकार की छूट नहीं दी जाएगी।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार यह टिप्पणी व्यक्तिगत स्वतंत्रता और मानवाधिकारों की रक्षा की दिशा में एक महत्वपूर्ण संकेत मानी जा रही है। अदालत का यह रुख इस बात को रेखांकित करता है कि किसी भी वयस्क व्यक्ति की स्वायत्तता और सहमति को कानून द्वारा सम्मान दिया जाना चाहिए, बशर्ते वह गतिविधि किसी अन्य कानून का उल्लंघन न करती हो।
इस टिप्पणी के बाद मानवाधिकार कार्यकर्ताओं और सामाजिक संगठनों ने इसे महिलाओं के अधिकारों की सुरक्षा की दिशा में एक सकारात्मक कदम बताया है। उनका कहना है कि इस तरह के निर्णय समाज में व्याप्त पूर्वाग्रहों को कम करने और न्याय व्यवस्था में संवेदनशीलता बढ़ाने में मदद करते हैं।
फिलहाल इस टिप्पणी को व्यापक कानूनी संदर्भ में देखा जा रहा है और माना जा रहा है कि आने वाले समय में यह समान मामलों में पुलिस और निचली अदालतों के लिए मार्गदर्शक सिद्ध हो सकती है।
