मन की बात: पीएम मोदी ने परमाणु उपलब्धि, पवन ऊर्जा और बुद्ध के संदेश पर दिया जोर
दशकों तक देश के अलग-अलग वर्ग अपने ही हक की जमीन के लिए संघर्ष करते रहे। कश्मीरी पंडित अपने घरों से विस्थापित होकर बेघर जीवन जीने को मजबूर रहे, आदिवासी समुदायों को अपनी ही पारंपरिक जमीन पर “अतिक्रमणकारी” माना जाता रहा, और गांवों में रहने वाले कई किसानों के पास अपनी जमीन या मकान के पक्के कागज तक नहीं थे।
2019 के बाद केंद्र सरकार द्वारा लिए गए कुछ बड़े फैसलों को इस स्थिति में बदलाव के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है। अनुच्छेद 370 हटने के बाद कश्मीर में जमीन और संपत्ति से जुड़े अधिकारों की नई व्यवस्था लागू हुई, जिसे वहां के लोगों के लिए अधिकारों की वापसी के रूप में देखा जा रहा है।
वहीं, वनाधिकार कानून के तहत बड़ी संख्या में आदिवासी परिवारों को जमीन के अधिकार दिए गए, जिससे उन्हें अपनी पारंपरिक जमीन पर कानूनी मान्यता मिली। यह कदम लंबे समय से चल रही उस समस्या के समाधान की दिशा में माना गया, जहां आदिवासी अपने ही जंगल और जमीन पर अधिकार साबित नहीं कर पाते थे।
इसके अलावा, स्वामित्व योजना के तहत गांवों में ड्रोन सर्वे के माध्यम से घरों और जमीन का रिकॉर्ड तैयार कर करोड़ों लोगों को संपत्ति के अधिकार के दस्तावेज दिए गए। इससे ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को पहली बार अपनी संपत्ति का आधिकारिक प्रमाण मिला, जिससे वे बैंकिंग, लोन और अन्य सुविधाओं का लाभ भी ले पा रहे हैं।
पहले जहां “जल, जंगल, जमीन” जैसे नारे अधिकारों की मांग को दर्शाते थे, वहीं अब “ड्रोन, कागज और डिजिटल रिकॉर्ड” के जरिए इन्हीं अधिकारों को कानूनी रूप देने की प्रक्रिया को रेखांकित किया जा रहा है।
इस पूरे बदलाव का सार यही बताया जा रहा है कि केवल आवाज उठाने से नहीं, बल्कि कानूनी दस्तावेजों और रिकॉर्ड में नाम दर्ज होने से ही वास्तविक अधिकार सुनिश्चित होते हैं, और इसी दिशा में इन पहलों को एक बड़े परिवर्तन के रूप में देखा जा रहा है।
न्यूज बाय
Sabiha khan
