पश्चिम बंगाल के फाल्टा क्षेत्र से जुड़ा एक कथित मामला सामने आने के बाद चुनावी माहौल एक बार फिर गरमा गया है। देबीपुर बूथ संख्या 177 को लेकर बीजेपी प्रत्याशी देबांगशु पांडा ने गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि बूथ पर मौजूद ईवीएम मशीन के बटन को टेप से ढका हुआ पाया गया, जिससे मतदाताओं को वोट डालने में बाधा आ रही थी।
प्रत्याशी ने इस घटना का वीडियो खुद सोशल मीडिया पर साझा किया और आरोप लगाया कि यह एक सुनियोजित प्रयास है, जिसके जरिए मतदान प्रक्रिया को प्रभावित किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस तरह की हरकतें लोकतांत्रिक प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सीधा हमला हैं और इससे मतदाताओं के अधिकारों का हनन होता है।
इस मुद्दे को और हवा तब मिली जब सुधानिधि बंद्योपाध्याय ने भी सोशल मीडिया पर प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि फाल्टा में गड़बड़ी की यह कोई पहली घटना नहीं है, बल्कि पहले भी इस तरह के आरोप सामने आ चुके हैं। उन्होंने इशारों-इशारों में सत्तारूढ़ दल पर निशाना साधते हुए निष्पक्ष चुनाव की मांग की।
पश्चिम बंगाल में चुनावों के दौरान बूथ कैप्चरिंग, हिंसा और गड़बड़ी के आरोप पहले भी लगते रहे हैं, जिनमें अक्सर तृणमूल कांग्रेस और भारतीय जनता पार्टी के बीच तीखी राजनीतिक बयानबाजी देखने को मिलती है। इस नए आरोप ने एक बार फिर इन बहसों को तेज कर दिया है।
सबसे बड़ा सवाल अब चुनाव आयोग की भूमिका और साख को लेकर उठ रहा है। आलोचकों का कहना है कि जब एक प्रत्याशी खुद वीडियो के जरिए कथित सबूत पेश कर रहा है, तो तत्काल और पारदर्शी कार्रवाई जरूरी है, ताकि जनता का भरोसा बना रहे।
इस पूरे घटनाक्रम ने लोकतंत्र की विश्वसनीयता पर भी व्यापक बहस छेड़ दी है। एक ओर देश 2047 तक “विकसित भारत” बनने का लक्ष्य लेकर आगे बढ़ रहा है, वहीं दूसरी ओर ऐसी घटनाएं यह सवाल खड़ा करती हैं कि क्या जमीनी स्तर पर चुनावी प्रक्रिया पूरी तरह निष्पक्ष और सुरक्षित है।
हालांकि, इन आरोपों की सच्चाई और पूरी तस्वीर सामने आने के लिए चुनाव आयोग की जांच और आधिकारिक रिपोर्ट का इंतजार करना जरूरी होगा। फिलहाल, यह मामला राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप के बीच लोकतांत्रिक व्यवस्था की पारदर्शिता पर एक बड़ा सवाल बनकर उभरा है।
NEWS BY : SABIHA KHAN
