न्यूज बाय – आज़म लाला
भोपाल। मध्य प्रदेश में वर्ष 2017 के बहुचर्चित नर्मदा पौधारोपण अभियान को लेकर एक बार फिर विवाद गहरा गया है। राज्य सरकार द्वारा उस समय नर्मदा नदी के किनारे बड़े पैमाने पर पौधारोपण किए जाने का दावा किया गया था, जिसे पर्यावरण संरक्षण और हरित क्षेत्र बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल बताया गया था। अब इस अभियान को लेकर कथित अनियमितताओं के आरोप सामने आने के बाद राजनीतिक और प्रशासनिक हलकों में नई बहस शुरू हो गई है।
मामले ने तब तूल पकड़ा जब एक पूर्व वन अधिकारी ने पौधारोपण अभियान में कथित गड़बड़ियों का आरोप लगाते हुए इसकी विस्तृत जांच और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने की मांग की। उनका दावा है कि पौधारोपण के आंकड़ों और जमीनी हकीकत के बीच अंतर की जांच होनी चाहिए। इसके बाद विपक्षी दलों ने भी सरकार को घेरते हुए पूरे मामले में जवाबदेही तय करने की मांग उठाई है।
दूसरी ओर, सरकार और संबंधित विभागों का कहना है कि नर्मदा संरक्षण और हरियाली बढ़ाने के लिए अभियान के तहत व्यापक स्तर पर कार्य किया गया था। अधिकारियों का तर्क है कि वर्षों पुराने इस अभियान से जुड़े तथ्यों और रिकॉर्ड की निष्पक्ष जांच के बाद ही किसी निष्कर्ष पर पहुंचा जा सकता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह मामला केवल पौधारोपण तक सीमित नहीं है, बल्कि सरकारी योजनाओं में पारदर्शिता, निगरानी और जवाबदेही से भी जुड़ा हुआ है। यदि किसी प्रकार की अनियमितता हुई है तो उसकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए, वहीं यदि आरोप निराधार हैं तो तथ्य भी सार्वजनिक होने चाहिए।
फिलहाल मामला कानूनी और राजनीतिक बहस का विषय बना हुआ है। वास्तविक स्थिति और जिम्मेदारियों का निर्धारण जांच एजेंसियों तथा आधिकारिक रिपोर्टों के सामने आने के बाद ही स्पष्ट हो सकेगा।
