News by Azam Lala
आज जब “डिजिटल इंडिया” का शोर दुनिया भर में सुनाई देता है, जब विकास के दावों के पुल आसमान तक बनाए जाते हैं, तब छिंदवाड़ा के एक छोटे से गांव की हकीकत उन तमाम दावों पर बड़ा सवाल खड़ा करती है
एक गर्भवती मां को अस्पताल नहीं, बल्कि उफनती नदी का सामना करना पड़ा। खटिया ही उसकी एम्बुलेंस बनी और गांव के नौजवान उसके सहारा। दर्द इतना बढ़ा कि रास्ते में ही बच्चे ने जन्म ले लिया।
ये सिर्फ़ एक वाक़िया नहीं, बल्कि उस निज़ाम का आईना है जहाँ आज भी कई बस्तियाँ सड़क, पुल और बेहतर स्वास्थ्य सुविधाओं से महरूम हैं। अफ़सोस इस बात का है कि आज भी किसी मां की ज़िंदगी किस्मत और मौसम के भरोसे छोड़ दी जाती है।
जब दुनिया भारत के डिजिटल सफ़र की मिसाल देती है, तब ऐसे मंजर यह सोचने पर मजबूर कर देते हैं कि क्या असली तरक़्क़ी सिर्फ़ शहरों तक महदूद है? गांवों के लोग भी उसी मुल्क के नागरिक हैं, जिन्हें सिर्फ़ वादे नहीं बल्कि बुनियादी सहूलियतों का हक़ चाहिए।
उम्मीद है कि यह दर्दनाक घटना महज़ एक ख़बर बनकर न रह जाए, बल्कि हुक्मरानों की ज़मीर को झकझोर दे और जल्द से जल्द उस इलाके में पुल, सड़क और बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं का इंतज़ाम हो, ताकि फिर किसी मां को अपने बच्चे को जन्म देने के लिए मौत से होकर न गुजरना पड़े।
