News by Azam Lala
भोपाल। सूत्रों के हवाले से मध्य प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव दस्तक देने जा रहा है। कोविड महामारी के दौरान शुरू हुई वह हेल्पलाइन सेवा, जिसने लाखों मरीजों को घर बैठे डॉक्टरों तक पहुंचने का रास्ता दिया था, अब बंद होने की कगार पर है। 30 जून के बाद राज्य स्वास्थ्य एजेंसी (SHA) हेल्पलाइन आधारित ओपीडी अपॉइंटमेंट सुविधा को पूरी तरह खत्म कर देगी।
इस फैसले के बाद मरीज न केवल फोन पर डॉक्टरों की उपलब्धता की जानकारी नहीं ले सकेंगे, बल्कि अस्पताल सेवाओं की जानकारी और ओपीडी बुकिंग जैसी सुविधाएं भी एक झटके में बंद हो जाएंगी।
महामारी में बनी थी राहत की सांस
जब कोरोना ने अस्पतालों के दरवाजों पर लंबी कतारें खड़ी कर दी थीं, तब यही हेल्पलाइन मरीजों के लिए राहत का जरिया बनी थी। एक फोन कॉल पर डॉक्टर का समय मिल जाता था और अस्पतालों के चक्कर कम लगते थे। शुरुआती दौर में प्रतिदिन सैकड़ों मरीज इस सेवा का फायदा उठा रहे थे।
लेकिन अब बढ़ती लागत और बजट की कमी के चलते इस व्यवस्था का अध्याय बंद किया जा रहा है।
डिजिटल इंडिया बनाम ज़मीनी हकीकत
सरकारी तंत्र इसे स्वास्थ्य सेवाओं के डिजिटलीकरण की दिशा में अहम कदम बता रहा है, मगर सवाल यह है कि क्या प्रदेश का हर नागरिक इस बदलाव के लिए तैयार है?
आज भी मध्य प्रदेश के हजारों गांवों में बुज़ुर्ग, अशिक्षित और तकनीक से दूर लोग मोबाइल ऐप और ऑनलाइन प्रक्रियाओं से सहज नहीं हैं। उनके लिए अस्पताल तक पहुंचने का सबसे आसान रास्ता फोन कॉल ही था। अब उन्हें डिजिटल सिस्टम की दहलीज पर खड़ा कर दिया जाएगा।
ऑनलाइन टोकन, फिर भी अस्पतालों में लाइन
स्वास्थ्य अधिकारों से जुड़े लोगों का कहना है कि ऑनलाइन टोकन मिलने के बावजूद अस्पतालों में पर्ची बनवाने और जांच के लिए घंटों इंतजार करना पड़ता है। ऐसे में केवल डिजिटल व्यवस्था पर भरोसा करना कई मरीजों के लिए नई परेशानी पैदा कर सकता है।
सबसे बड़ा सवाल: सुविधा बढ़ेगी या दूरी?
हुकूमत का दावा है कि डिजिटल व्यवस्था स्वास्थ्य सेवाओं को अधिक आधुनिक और पारदर्शी बनाएगी। लेकिन ज़मीन पर यह फैसला उन लोगों के लिए मुश्किल खड़ी कर सकता है, जिनके पास न स्मार्टफोन है, न इंटरनेट और न ही तकनीकी जानकारी।
स्वास्थ्य व्यवस्था के जानकार मानते हैं कि डिजिटल सिस्टम लागू करना अच्छी पहल है, मगर जब तक हर वर्ग को उसकी आसान पहुंच और समझ न हो, तब तक पुरानी सुविधाओं को पूरी तरह बंद करना जल्दबाज़ी साबित हो सकता है।
सरकारी अस्पतालों में फोन आधारित अपॉइंटमेंट सेवा का बंद होना महज़ एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि स्वास्थ्य सेवाओं तक आम आदमी की पहुंच से जुड़ा मुद्दा है। डिजिटल दौर में कदम बढ़ाना ज़रूरी है, लेकिन अगर तकनीक और जनता के बीच की दूरी कम नहीं हुई, तो यह बदलाव सुविधा से ज्यादा चुनौती बन सकता है।
30 जून के बाद असली इम्तिहान डिजिटल सिस्टम का नहीं, बल्कि मरीजों की पहुंच और सहूलत का होगा।
