Iran और United States के बीच वर्षों से चले आ रहे तनावपूर्ण संबंध अब कूटनीतिक बातचीत के जरिए नए मोड़ की ओर बढ़ते दिखाई दे रहे हैं। अंतरराष्ट्रीय सूत्रों और मीडिया रिपोर्ट्स के अनुसार, दोनों देशों के बीच कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर शुरुआती सहमति बन चुकी है और जल्द ही एक सीमित लेकिन अहम समझौते को अंतिम रूप देने के लिए उच्चस्तरीय वार्ता हो सकती है। यह घटनाक्रम ऐसे समय सामने आया है जब पश्चिम एशिया पहले से ही युद्ध, प्रतिबंधों और क्षेत्रीय संघर्षों के कारण अस्थिरता का सामना कर रहा है।
शुरुआत में चर्चा थी कि यह महत्वपूर्ण बैठक Islamabad में आयोजित हो सकती है, लेकिन अब कूटनीतिक हलकों में Geneva का नाम सबसे आगे माना जा रहा है। माना जा रहा है कि ईरान जिनेवा को अधिक तटस्थ, सुरक्षित और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर स्वीकार्य मंच मान रहा है। जिनेवा पहले भी कई वैश्विक शांति वार्ताओं और परमाणु समझौतों का केंद्र रहा है, इसलिए वहां बातचीत होने की संभावना को गंभीर माना जा रहा है।
हाल ही में Donald Trump के बयान और अमेरिकी मीडिया रिपोर्ट्स ने भी संकेत दिए हैं कि दोनों देशों के बीच बैकडोर डिप्लोमेसी तेज हो चुकी है। हालांकि अमेरिकी प्रशासन की ओर से बैठक के स्थान और एजेंडे पर अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है, लेकिन सूत्रों का दावा है कि वार्ता का खाका लगभग तैयार हो चुका है। दोनों पक्ष फिलहाल ऐसे प्रारंभिक समझौते पर काम कर रहे हैं, जो भविष्य में बड़े और व्यापक समझौते की नींव बन सकता है।
सूत्रों के अनुसार, जिन प्रमुख मुद्दों पर सहमति बनने की बात कही जा रही है उनमें ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर नियंत्रण, अंतरराष्ट्रीय निरीक्षण व्यवस्था को मजबूत करना, Strait of Hormuz क्षेत्र में सैन्य तनाव कम करना और ईरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में आंशिक राहत शामिल हैं। अमेरिका लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंतित रहा है, जबकि ईरान का कहना है कि उसका परमाणु कार्यक्रम केवल शांतिपूर्ण ऊर्जा जरूरतों के लिए है। दूसरी ओर, प्रतिबंधों के कारण ईरान की अर्थव्यवस्था पर भारी दबाव बना हुआ है और वह राहत की उम्मीद कर रहा है।
अगर यह समझौता अंतिम रूप लेता है, तो इसका असर केवल दोनों देशों तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरे पश्चिम एशिया की भू-राजनीति पर पड़ेगा। इससे क्षेत्र में सैन्य तनाव कम हो सकता है, तेल आपूर्ति अधिक स्थिर हो सकती है और वैश्विक बाजारों में कच्चे तेल की कीमतों पर भी असर देखने को मिल सकता है। विशेषज्ञों का मानना है कि होर्मुज जलडमरूमध्य में तनाव कम होने से अंतरराष्ट्रीय व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा को भी राहत मिलेगी, क्योंकि दुनिया के बड़े हिस्से का तेल परिवहन इसी मार्ग से होता है।
हालांकि विश्लेषकों का यह भी कहना है कि दोनों देशों के बीच अविश्वास की लंबी पृष्ठभूमि को देखते हुए अंतिम समझौते तक पहुंचना आसान नहीं होगा। पहले भी कई दौर की बातचीत राजनीतिक मतभेदों, क्षेत्रीय संघर्षों और प्रतिबंधों के मुद्दे पर टूट चुकी है। इसके बावजूद मौजूदा बातचीत को एक सकारात्मक संकेत माना जा रहा है, जो आने वाले समय में पश्चिम एशिया की राजनीति को नई दिशा दे सकता है।
न्यूज़ बाय
रज़ा लाला ख़ान
