News By Aazam Lala ✍️
भोपाल नगर निगम इन दिनों दीवारों पर “स्वच्छता अभियान” लिखवाकर ऐसा फख्र महसूस कर रहा है,
गोया पुराने भोपाल की हर गली में इत्र छिड़का जा रहा हो।
मगर ज़मीनी हक़ीक़त ये है कि शहर का हाल देखकर खुद गंदगी भी शर्मिंदा हो जाए।
कल ईद का त्योहार है…
लोग अपने घरों की सफाई में लगे हैं…
मगर पुराने भोपाल के कई वार्ड ऐसे पड़े हैं जैसे उनका कोई वारिस ही ना हो।
कहीं सीवेज का पानी सड़कों पर ऐसे बह रहा है
जैसे नगर निगम ने नालियों को नहीं, छोटी नहरों को मंजूरी दे रखी हो।
कहीं बदबू मारती नालियां लोगों का जीना हराम कर रही हैं…
तो कहीं कचरे के ढेरों में लगाई गई आग जहरीला धुआं बनकर घरों में दाखिल हो रही है।
ऐशबाग की बिस्मिल्लाह कॉलोनी से लेकर एक नम्बर रेलवे स्टेशन के पास बने कचरा घर तक,
हर तरफ वही मंज़र दिखाई देता है—
धुआं… बदबू… गंदगी… और जिम्मेदारों की खामोशी।
मगर निगम प्रशासन शायद अब भी ए.सी. दफ्तरों में बैठकर सफाई कर्मचारियों की दो-चार फोटो देखकर इत्मीनान कर लेता है कि “स्वच्छ भोपाल” का सपना पूरा हो चुका।
“काग़ज़ों में शहर चमकता रहा रात भर,
गली-मोहल्ले मगर गंदगी में डूबे रहे…”
जनप्रतिनिधियों का हाल भी दिलचस्प है…
अगर एक नाली साफ हो जाए तो सोशल मीडिया पर ऐसा प्रचार होता है,
जैसे पूरे वार्ड को आज ही दुबई बना दिया गया हो।
वार्ड 77 में 12 दुकानों से अस्पताल तक आए दिन बहता गंदा पानी…
वार्ड 78 में कचरे के अंबार…
वार्ड 41 में बदबू से उबलती नालियां…
और वार्ड 19 में सीवेज से लबालब सड़कें…
ये सब मिलकर पुराने भोपाल के “स्वच्छता अभियान” की असली तसवीर पेश कर रहे हैं।
सवाल ये भी है कि कागज़ों में सफाई कर्मचारियों की फौज दिखाई देती है,
मगर ज़मीन पर वही कर्मचारी आखिर गायब कहां हो जाते हैं?
सूत्र तो यहां तक कहते हैं कि कुछ लोग सिर्फ अंगूठा लगाकर तनख्वाह ले जाते हैं,
बाकी वक्त अपना कारोबार संभालते हैं।
अब इसमें कितनी सच्चाई है, ये जांच का विषय है…
मगर शहर वाले सब जानते हैं, बस खुलकर बोलते नहीं।
और सबसे बड़ा सवाल—
एक नम्बर रेलवे थाने से चंद कदम दूर कचरे में लगाई गई आग के पास खड़ा ट्रांसफार्मर…
अगर आग भड़क जाती…
अगर कोई बच्चा दम घुटने से मर जाता…
अगर बड़ा हादसा हो जाता…
तो क्या निगम प्रशासन जिम्मेदारी लेता?
या फिर हमेशा की तरह फाइलों में जांच बैठाकर मामला ठंडा कर दिया जाता?
अब ये मत कहिएगा कि “किसी शरारती तत्व ने आग लगा दी…”
शहर जानता है कि कचरा उठाने की मशक्कत से बचने का सबसे आसान तरीका क्या है—
कचरे में आग लगा दो…
ढेर भी खत्म… मेहनत भी खत्म… जिम्मेदारी भी खत्म…
अगर सच में कामचोरों पर लगाम कसनी है,
तो हर वार्ड में निगम हेल्पलाइन और व्हाट्सएप नम्बर लिखवाइए। जिसकी निगरानी निगम कमिश्नर करे
जनता खुद वीडियो भेजेगी…
फिर पता चल जाएगा कि सफाई सिर्फ पोस्टरों में हो रही है या शहर में भी।
“जिस शहर में बदबू गलियों की पहचान बन जाए,
वहां नारों से नहीं… नीयत से सफाई करनी पड़ती है…”
