संवाददाता : Azam lala
भोपाल। जिस मां-बाप ने अपनी औलाद की परवरिश में पूरी ज़िंदगी गुज़ार दी, बुढ़ापे में वही अक्सर अपने इलाज और देखभाल के लिए दूसरों के मोहताज नज़र आते हैं। ऐसे में अब बुज़ुर्ग वालिदैन की ख़िदमत को फ़र्ज़ ही नहीं बल्कि कर्मचारी अधिकार का हिस्सा बनाने की मांग तेज़ हो रही है।
ईपीएस-95 पेंशनर्स एसोसिएशन के राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं अमर शहीद फाउंडेशन के राष्ट्रीय महासचिव अरुण वर्मा ने केंद्र सरकार से मांग की है कि माता-पिता और सास-ससुर की देखभाल एवं इलाज के लिए कर्मचारियों को 45 दिन का सवैतनिक “पवित्र बंधन अवकाश” प्रदान किया जाए।
उन्होंने कहा कि आज की भागदौड़ भरी ज़िंदगी में अनेक कर्मचारी अपने बुज़ुर्ग माता-पिता की बीमारी और इलाज के दौरान उनके साथ पर्याप्त समय नहीं बिता पाते। कई बार नौकरी और पारिवारिक ज़िम्मेदारियों के बीच संतुलन बनाना मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में विशेष अवकाश की व्यवस्था बुज़ुर्गों के लिए राहत और कर्मचारियों के लिए सहारा साबित हो सकती है।
अरुण वर्मा ने मांग की है कि यह सुविधा केंद्र सरकार, राज्य सरकारों, सार्वजनिक उपक्रमों, निगम-मंडलों, प्राधिकरणों, परिषदों, सहकारी संस्थाओं तथा ऐसे निजी प्रतिष्ठानों में भी लागू की जाए जहां 10 या उससे अधिक कर्मचारी कार्यरत हों।
उनका कहना है कि यदि मातृत्व अवकाश, पितृत्व अवकाश और अन्य सामाजिक ज़िम्मेदारियों के लिए विशेष छुट्टियां दी जा सकती हैं, तो फिर उन माता-पिता की सेवा के लिए भी अलग अवकाश व्यवस्था होनी चाहिए जिन्होंने अपनी पूरी उम्र बच्चों के भविष्य को संवारने में लगा दी।
उन्होंने कहा कि बुज़ुर्गों की बढ़ती स्वास्थ्य समस्याओं को देखते हुए सरकार को संवेदनशील पहल करते हुए “पवित्र बंधन अवकाश” जैसी व्यवस्था लागू करने पर गंभीरता से विचार करना चाहिए, ताकि कर्मचारी अपने माता-पिता और सास-ससुर के इलाज एवं देखभाल के दौरान बिना नौकरी की चिंता के उनके साथ रह सकें।
इस मांग का समर्थन प्रो. आलोक रंजन, पी.सी. जैन, विश्व कल्याण रावत, आर.एस. रघुवंशी, ओ.पी. सोनी, एस.सी. त्रिपाठी, एस.एस. तिवारी, ए.के. ब्यौहार, तानसेन चंद्रवंशी, कमांडर अंजनी कुमार, विजय वर्मा सहित कई सामाजिक कार्यकर्ताओं और पेंशनर्स प्रतिनिधियों ने किया है।
सवाल सिर्फ़ छुट्टी का नहीं, बल्कि उस एहसास का है कि जिन हाथों ने उंगली पकड़कर चलना सिखाया, उनकी बीमारी के दिनों में औलाद उनके साथ खड़ी रह सके।
