देशभर में निजी अस्पतालों की कार्यप्रणाली को लेकर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। कई मामलों में आरोप सामने आए हैं कि अस्पताल मरीजों और उनके परिजनों की मजबूरी का फायदा उठाकर दवाइयों और इंजेक्शन पर मनमाने दाम वसूल रहे हैं। ताजा आरोपों के मुताबिक, करीब ₹1300 MRP वाले इंजेक्शन पर नया स्टिकर लगाकर मरीज से ₹5100 तक की रकम वसूली गई। इस तरह के मामलों ने स्वास्थ्य सेवाओं में पारदर्शिता और जवाबदेही पर बहस को तेज कर दिया है।
बताया जा रहा है कि कई निजी अस्पताल दवा कंपनियों या डिस्ट्रीब्यूटर्स से कम कीमत पर दवाएं खरीदते हैं, लेकिन मरीजों को वही दवाएं कई गुना अधिक दाम पर उपलब्ध कराई जाती हैं। आरोप यह भी हैं कि अस्पताल के भीतर स्थित मेडिकल स्टोर या संबद्ध फार्मेसी से ही दवा खरीदने का दबाव बनाया जाता है। मरीज के परिजनों को बाहरी मेडिकल स्टोर से दवा खरीदने की अनुमति नहीं दी जाती, जिससे उनके पास विकल्प सीमित रह जाते हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि ICU और इमरजेंसी वार्ड में भर्ती मरीजों के परिजन मानसिक तनाव और समय की कमी के कारण बिलों की विस्तार से जांच नहीं कर पाते। इसी स्थिति का फायदा उठाकर कई अस्पताल इलाज, जांच और दवाइयों के नाम पर भारी रकम जोड़ देते हैं। कई बार मरीज को कौन-सी दवा दी गई, उसकी वास्तविक कीमत क्या है और कितनी मात्रा में उपयोग हुई—इसकी स्पष्ट जानकारी तक परिवार को नहीं मिलती।
यह मुद्दा इसलिए भी गंभीर माना जा रहा है क्योंकि केंद्र सरकार Ayushman Bharat Yojana जैसी योजनाओं के जरिए गरीब और मध्यम वर्ग को सस्ती स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने का दावा करती है। इसके बावजूद बड़ी संख्या में मरीज निजी अस्पतालों में भारी बिलों के बोझ तले दब जाते हैं। कई परिवार इलाज के लिए कर्ज लेने, जमीन बेचने या आर्थिक संकट झेलने को मजबूर हो जाते हैं। स्वास्थ्य अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि इलाज अब सेवा कम और व्यवसाय अधिक बनता जा रहा है।
स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि इस समस्या को रोकने के लिए दवा और इलाज के बिल में पूरी पारदर्शिता जरूरी है। मरीजों को हर दवा की वास्तविक कीमत, उपयोग और विकल्प की जानकारी लिखित रूप में मिलनी चाहिए। साथ ही अस्पतालों में जेनरिक दवाओं का विकल्प अनिवार्य करने, मेडिकल बिल का डिजिटल ऑडिट और दवा कीमतों की नियमित निगरानी जैसी व्यवस्थाओं को मजबूत करने की मांग भी उठ रही है।
विशेषज्ञ यह भी कहते हैं कि सरकार और स्वास्थ्य नियामक संस्थाओं को निजी अस्पतालों की बिलिंग प्रणाली पर सख्त निगरानी रखनी होगी। यदि समय रहते प्रभावी नियम और कार्रवाई नहीं हुई, तो स्वास्थ्य सेवाओं पर आम लोगों का भरोसा कमजोर हो सकता है। समाज में डॉक्टरों को “भगवान” का दर्जा दिया जाता है, लेकिन कुछ संस्थानों पर लग रहे ऐसे आरोप पूरे चिकित्सा क्षेत्र की छवि को नुकसान पहुंचा रहे हैं।
फिलहाल यह मुद्दा केवल महंगे इलाज का नहीं, बल्कि स्वास्थ्य व्यवस्था में नैतिकता, पारदर्शिता और आम नागरिक के अधिकारों का भी बन चुका है। मरीज और उनके परिवार अब यह सवाल पूछ रहे हैं कि इलाज के नाम पर आखिर कब तक मजबूरी को मुनाफे में बदला जाता रहेगा।
न्यूज बाय: Sabiha Khan
