कोमा में पड़े पति का स्पर्म सुरक्षित (फ्रीज़) रखने की अनुमति देने के लिए एक महिला ने दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया है. इस मामले ने प्रजनन अधिकार, सहमति और मेडिकल एथिक्स को लेकर नई बहस छेड़ दी है. महिला के पति साल 2025 से कोमा में हैं और इस समय अस्पताल के आईसीयू में भर्ती हैं. डॉक्टरों के मुताबिक उनकी हालत बेहद गंभीर है और वे लाइफ सपोर्ट पर हैं. ऐसे में महिला चाहती है कि उसके पति का स्पर्म सुरक्षित रख लिया जाए ताकि भविष्य में वह उनके बच्चे को जन्म दे सके.
याचिका में मेडिकल एक्सपर्ट कमेटी बनाने का सुझाव
दिल्ली हाई कोर्ट में दाखिल याचिका में महिला की ओर से पेश वकील ने कोर्ट से कहा कि इस मामले में समय बहुत अहम है. अगर देरी हुई तो स्पर्म की गुणवत्ता खराब हो सकती है और महिला के लिए अपने पति के बच्चे की मां बनने का मौका खत्म हो सकता है. याचिका में यह भी सुझाव दिया गया है कि एक मेडिकल एक्सपर्ट कमेटी बनाई जाए, जो यह तय करे कि मरीज की हालत को देखते हुए स्पर्म निकालने की प्रक्रिया सुरक्षित तरीके से की जा सकती है या नहीं.
क्या है सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल?
डॉक्टरों के मुताबिक इस प्रक्रिया को सर्जिकल स्पर्म रिट्रीवल कहा जाता है. इसमें एक पतली सुई के जरिए टेस्टिस से स्पर्म निकाला जाता है और फिर उसे माइनस 196 डिग्री सेल्सियस पर क्रायोप्रिजर्वेशन तकनीक से लंबे समय तक सुरक्षित रखा जा सकता है. बाद में इसे IVF जैसी तकनीक से इस्तेमाल किया जा सकता है.
दिल्ली हाई कोर्ट के सामने आया कानूनी सवाल
दिल्ली हाई कोर्ट के सामने इस मामले में कानूनी पेच भी हैं. ऐसिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी एक्ट 2021 के मुताबिक स्पर्म के इस्तेमाल और संरक्षण के लिए पति-पत्नी दोनों की सहमति जरूरी होती है. लेकिन यहां पति कोमा में होने की वजह से अपनी सहमति देने की स्थिति में नहीं हैं. कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि भारत में किसी व्यक्ति की मौत के बाद उसके सुरक्षित रखे गए स्पर्म से बच्चे के जन्म से जुड़े मामलों पर कुछ न्यायिक विचार हो चुका है, लेकिन जब व्यक्ति जीवित हो और बेहोश या अक्षम स्थिति में हो ऐसे मामले बेहद दुर्लभ और जटिल माने जाते हैं.
केंद्र सरकार की ओर से अदालत को बताया गया कि मामले की संवेदनशीलता को देखते हुए इसे सावधानी से जांचा जा रहा है. क्योंकि इसका असर मौजूदा कानूनों पर भी पड़ सकता है.