मध्यप्रदेश हाई कोर्ट में धार के भोजशाला मंदिर-कमाल मौला मस्जिद परिसर के धार्मिक स्वरूप को लेकर चल रहे विवाद के मुकदमे में मंगलवार (07 अप्रैल) को हिंदू पक्ष ने अपनी दलील रखी. हिंदू पक्ष ने कहा कि 11वीं सदी के स्मारक परिसर का एक विवादित ढांचा वक्फ (धर्मार्थ अर्पित) संपत्ति कतई नहीं है और किसी जगह पर केवल नमाज पढ़ लेने से वह जगह कानूनन मस्जिद नहीं बन जाती.
भोजशाला को हिंदू समुदाय वाग्देवी (देवी सरस्वती) का मंदिर मानता है, जबकि मुस्लिम पक्ष इसे कमाल मौला मस्जिद बताता है. यह विवादित परिसर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) द्वारा संरक्षित है. हाई कोर्ट की इंदौर बेंच इस परिसर के धार्मिक स्वरूप के विवाद को लेकर दायर चार याचिकाओं और एक रिट अपील पर सोमवार (6 अप्रैल) से नियमित सुनवाई कर रही है.
‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ के वकील ने क्या दी दलील?
सुनवाई के दूसरे दिन याचिकाकर्ताओं में शामिल संगठन ‘हिंदू फ्रंट फॉर जस्टिस’ के वकील विष्णु शंकर जैन ने अदालत में अपनी दलीलें पेश करना जारी रखा. उन्होंने न्यायमूर्ति विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की खंडपीठ के सामने कहा कि विवादित परिसर में धार के परमार राजवंश के राजा भोज द्वारा 1034 में स्थापित सरस्वती मंदिर पहले से मौजूद था और इस जगह को ऐतिहासिक व राजस्व रिकॉर्ड में ‘भोजशाला’ के रूप में ही जाना जाता है.
भोजशाला परिसर में बने मंदिर को ढहाया गया- विष्णु शंकर जैन
उन्होंने देशी-विदेशी लेखकों की किताबों, एएसआई व पुरातत्व विभाग के प्रकाशित ग्रंथों और अन्य स्त्रोतों के हवाले से दावा किया कि भोजशाला परिसर में बने मंदिर को ढहाया गया और इसके अवशेषों से खड़े किए गए विवादित ढांचे को नमाज पढ़ने के लिए इस्तेमाल करना शुरू किया गया. हिंदू पक्ष के वकील ने जोर देकर कहा कि विवादित परिसर में मूलत: कोई मस्जिद मौजूद नहीं थी और किसी जगह पर केवल नमाज पढ़ने से वह जगह कानूनन मस्जिद नहीं बन जाती. उन्होंने कहा कि इस्लामी कानून के अनुसार मस्जिद के निर्माण के लिए जमीन को स्वेच्छा से वक्फ किया जाना जरूरी है.
‘भोजशाला को 1909 के पहले से संरक्षित स्मारक का दर्जा हासिल’
जैन ने कहा, ”भोजशाला को 1909 के पहले से संरक्षित स्मारक का दर्जा हासिल है और इसके परिसर का एक विवादित ढांचा वक्फ संपत्ति कतई नहीं है.” उन्होंने हिंदू धर्मशास्त्रों की मान्यताओं का हवाला देते हुए कहा कि जैसे ही किसी मंदिर में मूर्ति की प्राण-प्रतिष्ठा हो जाती है, वह जगह देवी-देवताओं की संपत्ति हो जाती है और एक बार मंदिर स्थापित हो जाने के बाद यह जगह हमेशा मंदिर ही रहती है. उन्होंने कहा,‘‘अगर कोई मंदिर ढहा दिया जाए, तब भी वह मंदिर होने के अपने मूल गुणधर्म नहीं खोता. इसलिए भोजशाला परिसर में केवल हिंदुओं को उपासना का अधिकार दिया जाना चाहिए.’’
ASI ने 7 अप्रैल 2003 को जारी किया था आदेश
भोजशाला परिसर को लेकर विवाद शुरू होने के बाद एएसआई ने सात अप्रैल 2003 को एक आदेश जारी किया था. इस आदेश के अनुसार अब तक चली आ रही व्यवस्था के मुताबिक हिंदुओं को इस परिसर में प्रत्येक मंगलवार पूजा करने की अनुमति है, जबकि मुस्लिमों को हर शुक्रवार वहां नमाज अदा करने की इजाजत दी गई है. हिंदू पक्ष का कहना है कि भोजशाला में स्थापित देवी सरस्वती की मूर्ति फिलहाल लंदन के एक संग्रहालय में रखी है और इस प्रतिमा को भारत वापस लाकर इसे फिर से परिसर में स्थापित किया जाना चाहिए. एएसआई ने हाई कोर्ट के आदेश पर दो साल पहले विवादित परिसर का वैज्ञानिक सर्वेक्षण करके अपनी विस्तृत रिपोर्ट सौंपी थी.
मुस्लिम पक्ष ने ASI के सर्वेक्षण पर उठाए सवाल
एएसआई की 2,000 से ज्यादा पन्नों की रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि इस परिसर में धार के परमार राजाओं के शासनकाल की एक विशाल संरचना मस्जिद के मुकाबले पहले से विद्यमान थी और वहां वर्तमान में मौजूद एक विवादित ढांचा मंदिरों के हिस्सों का फिर से इस्तेमाल करते हुए बनाया गया था.
मुस्लिम पक्ष ने एएसआई के सर्वेक्षण पर सवाल उठाते हुए हिंदुओं के इस दावे को खारिज किया है कि भोजशाला परिसर मूलत: एक मंदिर है. उनका आरोप है कि एएसआई ने उसकी पुरानी आपत्तियों को दरकिनार करते हुए विवादित परिसर में ‘पीछे के रास्ते से रखी गईं चीजों’ को भी सर्वेक्षण में शामिल किया.