मध्यप्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिले में प्रस्तावित केन-बेतवा लिंक प्रोजेक्ट को लेकर विरोध अब बड़े जनआंदोलन का रूप ले चुका है। 14 गांवों के आदिवासी किसान और ग्रामीण लगातार सरकार और प्रशासन के खिलाफ मोर्चा खोले हुए हैं। आंदोलन की जड़ में मुआवजा वितरण में कथित गड़बड़ी, जमीन अधिग्रहण की प्रक्रिया और 2021 की कट-ऑफ डेट को लेकर भारी नाराजगी है। ग्रामीणों का आरोप है कि वर्षों से जिन जमीनों पर उनका जीवन निर्भर है, उनके बदले उन्हें न तो न्यायसंगत मुआवजा मिला और न ही पुनर्वास को लेकर कोई स्पष्ट भरोसा दिया गया।
अप्रैल महीने में आंदोलन उस वक्त बेहद भावुक और उग्र हो गया जब प्रभावित गांवों में “चिता आंदोलन” और “जल सत्याग्रह” शुरू किया गया। महिलाओं, बुजुर्गों और बच्चों ने चिताओं पर लेटकर विरोध जताया और पानी में खड़े होकर सरकार के खिलाफ प्रदर्शन किया। आंदोलनकारियों का कहना था कि अगर उनकी जमीन और जंगल छीने जाएंगे तो उनके पास जीवन खत्म करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचेगा। इस दृश्य ने पूरे प्रदेश का ध्यान अपनी ओर खींचा और प्रशासन पर दबाव बढ़ा।
हालात तब और तनावपूर्ण हो गए जब प्रशासनिक टीम आंदोलन प्रभावित गांवों में पहुंची। ग्रामीणों ने अधिकारियों पर उनकी बात न सुनने और जबरन कार्रवाई करने का आरोप लगाया। विरोध इतना तेज हुआ कि ग्रामीणों ने अफसरों की टीम को गांव से वापस लौटने पर मजबूर कर दिया। इसके बाद प्रशासन ने हालात को नियंत्रित करने के लिए पन्ना-छतरपुर सीमा पर धारा 163 लागू कर दी और कई इलाकों में एंट्री पर सख्ती बढ़ा दी गई।
आंदोलनकारियों का आरोप है कि अब प्रभावित गांवों को लगभग “सील” कर दिया गया है। मीडिया, सामाजिक कार्यकर्ताओं और बाहरी नेताओं तक को अंदर जाने से रोका जा रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि सरकार आंदोलन की आवाज दबाने के लिए एंट्री बैन का इस्तेमाल कर रही है ताकि बाहर की दुनिया तक उनकी तकलीफें न पहुंच सकें। इससे स्थानीय लोगों में गुस्सा और बढ़ता जा रहा है।
लगातार बढ़ते दबाव और विरोध के बाद 18 अप्रैल को कलेक्टर ने सात दिन के भीतर री-सर्वे कराने के आदेश दिए। प्रशासन का कहना है कि जिन किसानों और ग्रामीणों को मुआवजे या सर्वे प्रक्रिया को लेकर शिकायत है, उनकी दोबारा जांच की जाएगी। हालांकि ग्रामीण इस आश्वासन पर भरोसा करने को तैयार नहीं हैं। उनका कहना है कि इससे पहले भी कई बार लिखित वादे किए गए लेकिन जमीन पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई।
12 मई को कांग्रेस का एक प्रतिनिधिमंडल भी प्रभावित गांवों का दौरा करने पहुंचा, लेकिन उन्हें भी अंदर जाने की अनुमति नहीं दी गई। कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने प्रशासन पर लोकतांत्रिक अधिकारों का हनन करने का आरोप लगाया। एक कार्यकर्ता ने प्रशासनिक अधिकारियों से कहा कि “हम डाका डालने नहीं जा रहे, सिर्फ लोगों की बात सुनने जा रहे हैं।” विवाद के दौरान प्रशासन और कांग्रेस कार्यकर्ताओं के बीच तीखी बहस भी हुई। बताया गया कि एक कार्यकर्ता ने डीएम को फोन कर नाराजगी जताते हुए कहा कि “जब तक नौकरी करेंगे, तब तक यह अपमान याद रखा जाएगा।”
अब सवाल सिर्फ मुआवजे का नहीं रह गया है, बल्कि भरोसे और संवाद का बन चुका है। एक तरफ सरकार इसे विकास परियोजना बता रही है, वहीं दूसरी तरफ प्रभावित आदिवासी समुदाय खुद को उपेक्षित और असुरक्षित महसूस कर रहा है। लगातार बढ़ती बंदिशें और एंट्री बैन हालात को और विस्फोटक बना सकते हैं। यदि प्रशासन और आंदोलनकारियों के बीच जल्द भरोसेमंद संवाद स्थापित नहीं हुआ, तो यह विवाद आने वाले दिनों में और बड़ा राजनीतिक और सामाजिक संघर्ष बन सकता है।
न्यूज़ बाय: Sabiha Khan
