न्यूज़ बाय : रज़ा लाला ख़ान
मई 2026 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नीदरलैंड यात्रा के दौरान, डच सरकार ने चोल राजवंश (Chola Dynasty) से जुड़े 11वीं शताब्दी के ऐतिहासिक ताम्र पत्र आधिकारिक तौर पर भारत को सौंप दिए हैं। यूरोप में इन्हें ‘लीडेन प्लेट्स’ (Leiden Plates) के नाम से जाना जाता था।
इस ऐतिहासिक उपलब्धि से जुड़े मुख्य बिंदु निम्नलिखित हैं:
ताम्र पत्रों का इतिहास और महत्व चोल साम्राज्य से संबंध: ये ताम्र पत्र चोल सम्राट राजेंद्र चोल प्रथम (Rajendra Chola I) के काल के हैं। इनमें उनके पिता राजा राजा चोल प्रथम द्वारा दिए गए एक मौखिक वचन को औपचारिक रूप दिया गया है।
दस्तावेज़ की भाषा में इस सेट में 21 बड़ी और 3 छोटी प्लेटें शामिल हैं। इन पर तमिल और संस्कृत दोनों भाषाओं में शिलालेख अंकित हैं। शाही मुहर के होने से लगभग 30 किलोग्राम वजन के ये ताम्र पत्र एक कांस्य की अंगूठी से जुड़े हुए हैं, जिस पर चोल राजवंश की शाही मुहर लगी है।
क्या लिखा है? ये ताम्र पत्र तमिलनाडु के नागपट्टिनम में स्थित बौद्ध मठ ‘चूलामणिवर्म-विहार’ को दिए गए भूमि दान का ऐतिहासिक दस्तावेज हैं। भारत की कूटनीतिक जीत और लंबे समय से प्रयास के चलते भारत साल 2012 से इन प्राचीन ऐतिहासिक दस्तावेजों को वापस लाने के लिए राजनयिक प्रयास कर रहा था। नीदरलैंड में मौजूदगी से डच नियंत्रण के दौरान 18वीं शताब्दी में एक मिशनरी द्वारा इन्हें भारत से नीदरलैंड ले जाया गया था और 19वीं शताब्दी के मध्य से ये नीदरलैंड की लीडेन यूनिवर्सिटी (Leiden University) में सुरक्षित रखे गए थे।
वैश्विक सम्मान मिलना इस हस्तांतरण को भारत की सांस्कृतिक धरोहरों की पुनर्प्राप्ति और भारत-नीदरलैंड संबंधों की मजबूती की दिशा में एक बड़ा कदम माना जा रहा है।
