रिपोर्ट: गोपाल देवकर, बुरहानपुर|कहा जाता है कि अगर किसी बच्चे के हाथ में किताब आ जाए, तो उसके हाथों से मजबूरी छूटने लगती है। शिक्षा सिर्फ अक्षर ज्ञान नहीं होती, बल्कि वह एक ऐसी ताकत है जो गरीबी, बेबसी और सामाजिक असमानता के अंधेरे को दूर कर सकती है। लेकिन आज भी समाज में ऐसे हजारों परिवार हैं, जिनके बच्चों के पास पढ़ने की इच्छा तो है, लेकिन कॉपी, पेन और किताब खरीदने के लिए जरूरी साधन नहीं हैं।
ऐसे समय में यदि कोई व्यक्ति आगे बढ़कर बच्चों से कहे— “तुम सिर्फ पढ़ाई करो… बाकी जिम्मेदारी मेरी…” तो यह किसी समाजसेवी से बढ़कर एक उम्मीद की किरण बन जाता है।
बुरहानपुर में पिछले 13 वर्षों से ऐसा ही एक प्रयास लगातार जारी है। लोहार मंडी वार्ड के पार्षद एवं डिप्टी स्पीकर फहीम हाशमी हर वर्ष हजारों जरूरतमंद विद्यार्थियों को निशुल्क शैक्षणिक सामग्री उपलब्ध कराकर उनके सपनों को आगे बढ़ाने का काम कर रहे हैं। बिना किसी बड़े मंच, प्रचार या संस्थागत सहायता के यह अभियान आज हजारों परिवारों के लिए उम्मीद का दूसरा नाम बन चुका है।
शिक्षा नहीं रुके, यही संकल्प
शिक्षा को समाज की सबसे बड़ी ताकत माना जाता है, लेकिन आर्थिक कमजोरी अक्सर बच्चों को स्कूल से दूर कर देती है। कई परिवार ऐसे होते हैं जहां बच्चों की फीस से पहले घर का राशन जरूरी हो जाता है और कॉपी-किताबें एक अतिरिक्त बोझ बन जाती हैं।
इन्हीं परिस्थितियों को समझते हुए फहीम हाशमी ने वर्षों पहले एक छोटा प्रयास शुरू किया था, जो आज एक बड़े सामाजिक अभियान का रूप ले चुका है।
हर वर्ष नया शिक्षा सत्र शुरू होने से पहले चार दिनों तक एक विशेष वितरण अभियान संचालित किया जाता है, जिसमें गरीब और जरूरतमंद विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए जरूरी सामग्री उपलब्ध कराई जाती है।
यहां धर्म नहीं, जरूरत पहचान बनती है
इस अभियान की सबसे खास बात इसकी सोच है।
यहां किसी बच्चे से उसका धर्म, जाति या सामाजिक पहचान नहीं पूछी जाती। सिर्फ इतना देखा जाता है कि बच्चा जरूरतमंद है और पढ़ना चाहता है।
इसी सोच ने इस पहल को समाज में एक अलग पहचान दी है।
हजारों विद्यार्थियों तक पहुंचती है मदद
इस अभियान के तहत कक्षा पहली से लेकर बारहवीं तक पढ़ने वाले विद्यार्थियों को कॉपियां, पेन, पेंसिल, रबर, ज्योमेट्री बॉक्स, लॉन्ग रजिस्टर सहित पढ़ाई में उपयोग होने वाली लगभग सभी आवश्यक स्टेशनरी सामग्री निशुल्क दी जाती है।
सिलेबस की पुस्तकों को छोड़कर पढ़ाई के लिए जरूरी लगभग हर सामग्री उपलब्ध कराई जाती है ताकि बच्चों की पढ़ाई आर्थिक कारणों से प्रभावित न हो।
हर वर्ष करीब 15 से 20 हजार विद्यार्थी इस अभियान का लाभ लेते हैं।
पारदर्शिता के साथ जरूरतमंदों तक पहुंच
सहायता वितरण के लिए भी एक व्यवस्थित प्रक्रिया अपनाई जाती है।
इसमें मुख्य रूप से सरकारी और निम्न आय वर्ग से जुड़े विद्यार्थियों को शामिल किया जाता है। जरूरतमंद परिवारों का पंजीकरण किया जाता है और सामग्री वितरण के समय अभिभावकों की उपस्थिति भी सुनिश्चित की जाती है।
इसका उद्देश्य सिर्फ एक है— सहायता सही बच्चे तक पहुंचे।
अभियान से जुड़े लोगों का मानना है कि कई ऐसे बच्चे जो आज प्रशासनिक सेवाओं, इंजीनियरिंग, चिकित्सा या अन्य बड़े सपने देख रहे हैं, उनके लिए यह छोटी मदद भविष्य की बड़ी शुरुआत बन रही है।
बच्चों की मुस्कान ही सबसे बड़ी उपलब्धि
इस अभियान का सबसे भावनात्मक पहलू वह क्षण होता है जब किसी बच्चे के चेहरे पर खुशी दिखाई देती है या किसी माता-पिता की आंखों से आर्थिक चिंता कम होती नजर आती है।
एक कॉपी किसी के लिए मामूली चीज हो सकती है, लेकिन किसी जरूरतमंद परिवार के लिए वही कॉपी बच्चे के भविष्य की पहली सीढ़ी बन जाती है।
बिना संस्था, बिना अनुदान— पूरी तरह व्यक्तिगत प्रयास
इस पूरे अभियान की एक और उल्लेखनीय बात यह है कि इसके संचालन के लिए किसी संस्था या सरकारी अनुदान का सहारा नहीं लिया जाता।
हर वर्ष इस कार्य पर लगभग दो से तीन लाख रुपये खर्च किए जाते हैं और इसका पूरा व्यय फहीम हाशमी स्वयं वहन करते हैं।
यह पहल केवल सामग्री वितरण नहीं, बल्कि सामाजिक जिम्मेदारी और व्यक्तिगत संकल्प का उदाहरण बन चुकी है।
इंसानियत का ऐसा संदेश जो समाज को जोड़ता है
आज जब समाज कई स्तरों पर विभाजित दिखाई देता है, तब ऐसी पहल यह संदेश देती है कि बदलाव के लिए हमेशा बड़े पद या बड़े संसाधनों की जरूरत नहीं होती।
जरूरत होती है एक बड़े दिल, साफ नीयत और उस विश्वास की कि शिक्षा से समाज बदला जा सकता है।
फहीम हाशमी का मानना है कि बच्चे पढ़ेंगे तो परिवार आगे बढ़ेंगे, और परिवार आगे बढ़ेंगे तो समाज मजबूत होगा।
शिक्षा का उजाला आगे भी फैलता रहे
हर चुनाव, हर भाषण और हर बड़े वादे से कहीं ज्यादा असर उस कॉपी का होता है जो किसी बच्चे के हाथ में पहुंचती है।
क्योंकि वही बच्चा आगे चलकर डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, अधिकारी या फिर किसी और जरूरतमंद बच्चे का सहारा बन सकता है।
13 वर्षों से हजारों बच्चों की आंखों में शिक्षा का उजाला भरने वाला यह प्रयास केवल स्टेशनरी वितरण नहीं, बल्कि उम्मीद, विश्वास और इंसानियत की ऐसी मिसाल है जो समाज को बेहतर दिशा देने का काम कर रही है।
