संवाददाता : Azam lala
ग़म, हैवानियत और ख़ामोशी का वो मकान…
प्रयागराज के साउथ मलाका में हीवेट रोड के पास खड़ा एक मकान आज सिर्फ़ ईंट और पत्थरों का ढांचा नहीं, बल्कि ग़म, ख़ौफ़ और हैवानियत की एक ऐसी दास्तान बन चुका है जिसने हर सुनने वाले के दिल को दहला दिया।
बाहर से सब कुछ आम नज़र आ रहा था। दरवाज़े पर ताला लगा था, गलियों में रोज़ की तरह चहल-पहल थी, मगर उस बंद मकान के भीतर मौत कई दिनों से अपना डेरा डाले बैठी थी। किसी को अंदाज़ा नहीं था कि जिन लोगों को पड़ोसी रोज़ देखा करते थे, वो अब इस दुनिया में नहीं रहे।
जब मकान से उठती बदबू ने लोगों को बेचैन किया और पुलिस को ख़बर दी गई, तब किसी ने भी नहीं सोचा था कि अंदर ऐसा मंज़र उनका इंतज़ार कर रहा होगा। गेट टूटा, पुलिस अंदर दाख़िल हुई और फिर जो दिखाई दिया, उसने हर आंख को नम और हर दिल को सन्न कर दिया।
एक कमरे में बिस्तर पर वीरेंद्र कुमार वैश्य, उनकी हमसफ़र अनीता और बेटी मीनाक्षी की बेजान लाशें पड़ी थीं। सिर पर गहरे ज़ख्म, कमरे में पसरी ख़ामोशी और सूख चुका ख़ून इस बात की गवाही दे रहा था कि मौत यहां कई घंटे नहीं, बल्कि कई दिनों पहले दस्तक दे चुकी थी। नीचे दुकान में बेटे अभिषेक का शव मिला। एक ही परिवार के चार चिराग़ बुझ चुके थे।
सबसे दर्दनाक सवाल यह है कि आख़िर उस रात ऐसा क्या हुआ होगा? क्या इन लोगों ने अपने क़ातिल को पहचाना होगा? क्या किसी अपने चेहरे के पीछे छिपी हैवानियत को देखकर भी यक़ीन नहीं कर पाए होंगे? क्या मदद के लिए उठे हाथों को कोई सहारा नहीं मिला?
यह सिर्फ़ चार लोगों का क़त्ल नहीं, बल्कि इंसानी रिश्तों पर उठता एक बड़ा सवाल है। अगर यह किसी अपने की साज़िश निकली तो फिर भरोसे का क़त्ल भी उतना ही बड़ा होगा जितना इन चार ज़िंदगियों का।
पुलिस हर पहलू से तहक़ीक़ात कर रही है। जायदाद, पारिवारिक रिश्ते, कारोबारी विवाद और पुरानी रंजिश—हर एंगल पर जांच जारी है। मगर जब तक क़ातिल बेनक़ाब नहीं होता, तब तक यह मकान, यह ख़ामोशी और यह चार लाशें समाज से एक ही सवाल पूछती रहेंगी—
आख़िर इंसान कब इतना हैवान बन जाता है कि एक पूरे ख़ानदान की सांसें छीन लेता है?
प्रयागराज का यह क़त्लकांड सिर्फ़ एक पुलिस केस नहीं, बल्कि ग़म, दर्द, ख़ामोशी और हैवानियत की ऐसी कहानी है, जिसने हर संवेदनशील दिल को झकझोर कर रख दिया है।
