इंसाफ क्या नाम देख कर दिया जाएगा ?
जुर्म एक तो सज़ा अलग क्यों ?
न्यूज़ बाय
रज़ा लाला ख़ान
किसी ने एक तरफा प्यार के लिए एक बच्चे की जान ले ली।
किसी ने दोस्ती जैसे पाक रिश्ते में नफ़रत का ख़ंजर घोप दिया।
किसी मां की गोद उजड़ी, किसी घर का चिराग बुझ गया,
मगर इंसाफ़ के तराज़ू में फिर भी फर्क क्यों रह गया।
नाम बदल जाए तो क्या खून का रंग बदल जाता है?
नाम बदल जाए तो क्या इंसाफ बदल जाता है?
नाम बदल जाए तो क्या कानून बदल जाता है?
एक मासूम का दर्द क्या किसी नाम के बदल जाने से क्या कम हो जाता है?
इंसाफ का तराज़ू सब के लिए बराबर होना चाहिए ना कि नाम के बदल जाने से इंसाफ़ बदल जाए।
