जाहिद खान की रिपोर्ट
न्यूज़ 100
भोपाल पुलिस क्राइम ब्रांच ने एक बार फिर नशे के कारोबार पर कार्रवाई करते हुए 7 किलो 670 ग्राम गांजा और एक मोबाइल फोन के साथ आरोपियों को गिरफ़्तार किया है। पुलिस की तरफ़ से इसे “निरंतर कार्रवाई” बताया जा रहा है। करोड़ों के शहर में लाखों का ज़हर पकड़ना निश्चित तौर पर एक अहम काम है, लेकिन सवाल वही पुराना है — आखिर इतनी लगातार कार्रवाई के बावजूद शहर से अवैध नशे का कारोबार खत्म क्यों नहीं हो रहा?
हर कुछ दिनों में पुलिस प्रेस नोट जारी करती है, कहीं गांजा पकड़ा जाता है, कहीं स्मैक, कहीं शराब, तो कहीं नशीली गोलियां… मगर इसके बावजूद नशे का नेटवर्क पहले से ज़्यादा मज़बूत नज़र आता है। मोहल्लों से लेकर सुनसान मैदानों तक, सप्लाई चैन आखिर किसकी सरपरस्ती में चल रही है — ये सवाल अब आम लोगों की ज़ुबान पर है।
उर्दू में एक कहावत है —
“छोटी मछलियाँ जाल में जल्दी फँस जाती हैं, मगर बड़े मगरमच्छ गहरे पानी में छुपे रहते हैं।”
शहर की अवैध मंडियों पर भी शायद यही मिसाल फिट बैठती दिखाई दे रही है।
क्राइम ब्रांच जिन लोगों को पकड़ रही है, वो ज़्यादातर सप्लाई करने वाले छोटे चेहरे होते हैं। मगर वो बड़े चेहरे कहाँ हैं जो इस पूरे धंधे को पैसा, संरक्षण और नेटवर्क देते हैं? आख़िर क्यों हर बार सिर्फ़ “कैरीयर” या “छोटे तस्कर” ही पुलिस की गिरफ्त में आते हैं? क्या असली सरगना कानून की पकड़ से दूर हैं या फिर सिस्टम की परछाइयों में सुरक्षित बैठे हैं?
गोविंदपुरा के खाली मैदान से लेकर शहर की गलियों तक नशे का कारोबार ये साबित कर रहा है कि तस्करों के हौसले अभी भी पूरी तरह पस्त नहीं हुए। अगर पुलिस की कार्रवाई वाकई जड़ों तक पहुंच रही होती, तो शायद बार-बार एक ही तरह की खबरें सामने नहीं आतीं।
हालांकि पुलिस अधिकारियों की मेहनत और फील्ड में काम कर रही टीमों पर सवाल नहीं उठाया जा सकता, लेकिन जनता अब सिर्फ़ “बरामदगी” नहीं बल्कि “नेटवर्क के सफाए” की उम्मीद कर रही है। क्योंकि जब तक बड़े मगरमच्छ कानून के शिकंजे में नहीं आएंगे, तब तक छोटी मछलियों की गिरफ्तारी से शहर का ज़हर पूरी तरह खत्म होता नज़र नहीं आएगा।
