न्यूज बाय – अमन नीलकंठ
क्या एक शिक्षक को इतना अधिकार है कि वह मासूम बच्चों पर अपना गुस्सा उतारने लगे? सोशल मीडिया पर सामने आए एक वीडियो ने लोगों को झकझोर कर रख दिया है, जिसमें एक छोटी बच्ची को बेरहमी से पीटते हुए देखा जा सकता है। जिस हाथ में किताब और संस्कार होने चाहिए, वही हाथ जब हिंसा पर उतर आएं, तो सवाल सिर्फ एक शिक्षक पर नहीं बल्कि पूरी शिक्षा व्यवस्था पर खड़े होते हैं।
शिक्षक का काम बच्चों को शिक्षा देना, उनका मार्गदर्शन करना और अनुशासन सिखाना होता है, न कि डर और हिंसा के जरिए उन्हें मानसिक और शारीरिक पीड़ा देना। कई बार निजी तनाव, पारिवारिक समस्याएँ या कार्य का दबाव व्यक्ति के व्यवहार को प्रभावित कर सकता है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसका गुस्सा मासूम बच्चों पर निकाला जाए। स्कूल बच्चों के लिए सुरक्षित जगह मानी जाती है और यदि वहीं डर का माहौल बनने लगे, तो यह बेहद गंभीर चिंता का विषय है।
बाल मनोवैज्ञानिकों के अनुसार, बचपन में होने वाली मारपीट और अपमान बच्चों के आत्मविश्वास और मानसिक विकास पर गहरा असर डालते हैं। कई बच्चे डर की वजह से स्कूल जाना तक छोड़ देते हैं या फिर अंदर ही अंदर मानसिक तनाव का शिकार हो जाते हैं। यही कारण है कि कानून भी स्कूलों में शारीरिक दंड को पूरी तरह गलत और दंडनीय मानता है।
यह घटना एक बार फिर इस जरूरत को सामने लाती है कि शिक्षकों को सिर्फ विषयों की ट्रेनिंग ही नहीं बल्कि भावनात्मक नियंत्रण, बच्चों से संवाद और संवेदनशील व्यवहार की भी नियमित ट्रेनिंग दी जाए। स्कूल प्रबंधन की जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए कि ऐसे मामलों पर तुरंत कार्रवाई हो और बच्चों की सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाए।
अभिभावकों का कहना है कि वे अपने बच्चों को स्कूल पढ़ने और बेहतर इंसान बनने भेजते हैं, न कि डर और हिंसा झेलने के लिए। एक अच्छे शिक्षक की पहचान सिर्फ उसके ज्ञान से नहीं, बल्कि उसके धैर्य, संवेदनशीलता और व्यवहार से होती है। अनुशासन जरूरी हो सकता है, लेकिन हिंसा कभी भी शिक्षा का हिस्सा नहीं बन सकती।
