दिल्ली के जनकपुरी इलाके में 3 साल की मासूम बच्ची के साथ कथित रेप के मामले में आरोपी के महज एक हफ्ते के भीतर रिहा होने की खबर ने लोगों को झकझोर दिया है। इस घटना ने सिर्फ एक अपराध नहीं बल्कि देश की न्याय व्यवस्था, पुलिस जांच और बच्चों की सुरक्षा को लेकर कई बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं। आम लोगों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि जिस अपराध को कानून “जघन्य” मानता है, उसमें आरोपी इतनी जल्दी बाहर कैसे आ गया?
भारत में बच्चों के खिलाफ यौन अपराधों के लिए बनाया गया Protection of Children from Sexual Offences Act यानी POCSO एक्ट बेहद सख्त माना जाता है। खासकर 12 साल से कम उम्र की बच्चियों के साथ दुष्कर्म के मामलों में कानून कठोर सजा का प्रावधान देता है, जिसमें उम्रकैद से लेकर मौत की सजा तक शामिल हो सकती है। ऐसे मामलों में सामान्य परिस्थितियों में जमानत मिलना आसान नहीं माना जाता। इसलिए जब किसी आरोपी को कुछ ही दिनों में राहत मिलती है, तो स्वाभाविक रूप से लोगों का भरोसा डगमगाने लगता है।
अब सवाल यह उठ रहे हैं कि आखिर अदालत ने किस आधार पर आरोपी को जमानत दी। क्या पुलिस जांच में कोई कमी रही? क्या शुरुआती सबूत पर्याप्त नहीं थे? क्या मेडिकल रिपोर्ट या गवाहों की स्थिति कमजोर थी? या फिर जांच एजेंसियों ने केस को मजबूत तरीके से पेश नहीं किया? कानूनी विशेषज्ञ मानते हैं कि अदालतें जमानत देते समय पुलिस की केस डायरी, सबूतों की स्थिति, आरोपी के फरार होने की संभावना और जांच की प्रगति जैसे पहलुओं को देखती हैं। लेकिन जब मामला एक 3 साल की बच्ची से जुड़ा हो, तब समाज अदालत और प्रशासन दोनों से ज्यादा संवेदनशील और सख्त रवैये की उम्मीद करता है।
इस घटना के बाद सोशल मीडिया और नागरिक समूहों में भारी नाराजगी दिखाई दे रही है। लोगों का कहना है कि ऐसे मामलों में यदि आरोपी जल्दी बाहर आने लगेंगे, तो पीड़ित परिवार का न्याय व्यवस्था से भरोसा टूट जाएगा। साथ ही अपराधियों के भीतर यह संदेश भी जाएगा कि कुछ समय बाद वे आसानी से बाहर आ सकते हैं। यही वजह है कि लोग इस पूरे मामले में पारदर्शिता की मांग कर रहे हैं।
कई सामाजिक संगठनों और महिला अधिकार कार्यकर्ताओं का कहना है कि Delhi Commission for Women, बाल अधिकार आयोग और उच्च न्यायालय को इस मामले में स्वतः संज्ञान लेना चाहिए। यह भी मांग उठ रही है कि जमानत आदेश, पुलिस की रिपोर्ट और सरकारी वकील की दलीलों को सार्वजनिक किया जाए ताकि लोगों को समझ आ सके कि आखिर अदालत ने आरोपी को राहत क्यों दी। पारदर्शिता की कमी अक्सर न्याय व्यवस्था पर संदेह बढ़ाती है।
देश में लंबे समय से “बेटी बचाओ” और महिलाओं की सुरक्षा को लेकर बड़े अभियान चलाए जाते रहे हैं, लेकिन ऐसी घटनाएं उन नारों की प्रभावशीलता पर सवाल खड़े करती हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि कानून सख्त होने से ज्यादा जरूरी उसका प्रभावी क्रियान्वयन है। यदि जांच कमजोर होगी, सबूत समय पर इकट्ठे नहीं होंगे और ट्रायल लंबा खिंचेगा, तो कठोर कानून भी लोगों को न्याय का भरोसा नहीं दिला पाएंगे।
इस पूरे मामले ने एक बार फिर यह बहस तेज कर दी है कि बच्चों के खिलाफ अपराधों में न्याय प्रक्रिया कितनी संवेदनशील और प्रभावी है। लोगों की मांग है कि ऐसे मामलों में तेज और निष्पक्ष जांच हो, फास्ट ट्रैक अदालतें समयबद्ध फैसले दें और पीड़ित परिवारों को कानूनी व मानसिक सहायता उपलब्ध कराई जाए। क्योंकि इंसाफ में देरी जितनी खतरनाक है, उससे भी ज्यादा खतरनाक वह स्थिति है जब लोगों को लगे कि इंसाफ का मजाक बनाया जा रहा है।
न्यूज़ बाय: Sabiha Khan
