Narendra Modi ने फरवरी 2023 में जिस सोहना-दौसा एक्सप्रेसवे का उद्घाटन देश की आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर क्रांति के प्रतीक के रूप में किया था, वही एक्सप्रेसवे अब अपनी बदहाल हालत को लेकर सवालों के घेरे में है। करोड़ों नहीं बल्कि हजारों करोड़ रुपये की लागत से तैयार इस हाई-प्रोफाइल परियोजना की सड़कें महज दो साल के भीतर ही बारिश के सामने जवाब देती नजर आ रही हैं। कई जगह सड़क धंस चुकी है, बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं और वाहन चालकों की जान जोखिम में पड़ गई है।
हालिया बारिश के बाद एक्सप्रेसवे के कई हिस्सों में 10 से 15 फीट तक गहरे गड्ढे बन गए। कहीं सड़क की ऊपरी परत उखड़ गई तो कहीं पूरी लेन नीचे बैठ गई। सोशल मीडिया पर वायरल तस्वीरों और वीडियो में ट्रक, कारें और अन्य वाहन इन गड्ढों में फंसते दिखाई दे रहे हैं। लोग तंज कसते हुए कह रहे हैं कि “दिल्ली-मुंबई एक्सप्रेसवे पर अब पाताल लोक की एंट्री भी फ्री हो गई है।” यात्रियों का कहना है कि जिस सड़क को हाई-स्पीड और सुरक्षित यात्रा के लिए बनाया गया था, वही अब हादसों का कारण बनती जा रही है।
सबसे बड़ा सवाल निर्माण की गुणवत्ता को लेकर उठ रहा है। लोगों का आरोप है कि एक्सप्रेसवे निर्माण में घटिया सामग्री का इस्तेमाल किया गया और समय से पहले उद्घाटन करने की जल्दबाजी में गुणवत्ता जांच को नजरअंदाज कर दिया गया। सवाल यह भी उठ रहा है कि क्या निर्माण कार्य पूरा होने से पहले थर्ड पार्टी ऑडिट कराया गया था या सिर्फ कागजी औपचारिकताओं के आधार पर परियोजना को जनता के लिए खोल दिया गया। यदि ऑडिट हुआ था, तो इतनी बड़ी तकनीकी खामियां आखिर कैसे नजरअंदाज हो गईं?
भारतीय राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण यानी NHAI अब भी इस एक्सप्रेसवे पर यात्रियों से पूरा टोल टैक्स वसूल रही है, लेकिन सड़क की हालत देखकर लोग खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। वाहन चालकों का कहना है कि जब सड़कें सुरक्षित और टिकाऊ नहीं हैं तो फिर भारी टोल लेने का औचित्य क्या है। कई लोगों ने सोशल मीडिया पर इसे “टोल के बदले गड्ढा सेवा” तक बता दिया है।
इंफ्रास्ट्रक्चर विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी एक्सप्रेसवे की उम्र और मजबूती उसकी बेस लेयर, ड्रेनेज सिस्टम और निर्माण गुणवत्ता पर निर्भर करती है। यदि शुरुआती वर्षों में ही सड़क धंसने लगे तो यह गंभीर इंजीनियरिंग और निगरानी विफलता का संकेत माना जाता है। लगातार बारिश के बाद इस तरह की क्षति यह भी दर्शाती है कि जल निकासी व्यवस्था पर्याप्त नहीं थी, जिससे सड़क की नींव कमजोर हुई।
विपक्षी दलों ने भी इस मुद्दे को लेकर केंद्र सरकार पर हमला बोला है। उनका आरोप है कि सरकार इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं को चुनावी प्रचार और फोटो-ऑप में बदल रही है, जबकि गुणवत्ता और सुरक्षा जैसे मूल मुद्दों की अनदेखी की जा रही है। लोगों की मांग है कि इस पूरे मामले की स्वतंत्र तकनीकी जांच कराई जाए, जिम्मेदार ठेकेदारों और अधिकारियों पर कार्रवाई हो और भविष्य में ऐसी परियोजनाओं में पारदर्शिता सुनिश्चित की जाए।
अब जनता का सवाल सीधा है—क्या खराब निर्माण करने वाले ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट किया जाएगा, या फिर वही कंपनियां नए टेंडर लेकर दोबारा सरकारी परियोजनाओं में काम करती रहेंगी? जब तक “रिबन कटिंग” से ज्यादा “क्वालिटी चेकिंग” पर ध्यान नहीं दिया जाएगा, तब तक देश के एक्सप्रेसवे सिर्फ उद्घाटन मंचों और चुनावी भाषणों की शोभा बनकर रह जाएंगे, जबकि आम जनता गड्ढों में अपनी जान और टैक्स दोनों गंवाती रहेगी।
न्यूज बाय: Sabiha Khan
