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कौन थीं देश की पहली महिला आईएएस, जानें उस समय उन्हें कितनी मिलती थी सैलरी?

आज सिविल सेवा में महिलाओं की भागीदारी बढ़ती दिखती है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब प्रशासनिक सेवा को महिलाओं के लिए सही नहीं माना जाता था. उसी दौर में केरल की एक युवती ने ठान लिया कि वह वही करेगी, जिसे लोग असंभव कहते हैं. यह कहानी है अन्ना राजम मल्होत्रा की, जो भारत की पहली महिला आईएएस अधिकारी बनीं. साल 1951 में, जब देश नई व्यवस्था बना रहा था, अन्ना ने अपने साहस और मेहनत से इतिहास रच दिया.

अन्ना राजम का जन्म केरल में हुआ. वे पढ़ाई में बहुत तेज थीं. उन्होंने कोझिकोड में स्कूली शिक्षा पूरी की और मद्रास यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी साहित्य में पढ़ाई की. उस समय बहुत कम लड़कियाँ उच्च शिक्षा तक पहुँच पाती थीं. अन्ना ने पढ़ाई को ही अपनी सबसे बड़ी ताकत बनाया.

इंटरव्यू में लिया बड़ा फैसला

साल 1950 में उन्होंने सिविल सेवा परीक्षा पास की. इंटरव्यू के दौरान उन्हें सलाह दी गई कि वे विदेश सेवा या दूसरी केंद्रीय सेवाएं चुन लें, क्योंकि प्रशासनिक सेवा महिलाओं के लिए कठिन मानी जाती थी. लेकिन अन्ना ने साफ कहा कि उन्हें आईएएस ही बनना है. यह फैसला उस समय बहुत साहसी माना गया.

पहली पोस्टिंग, पहली चुनौती

1951 में वे मद्रास कैडर में आईएएस बनीं. उनकी पहली पोस्टिंग तिरुपत्तूर में सब-कलेक्टर के रूप में हुई. एक महिला अधिकारी को मैदान में काम करते देखना लोगों के लिए नया था. शुरू में विरोध और संदेह हुआ, लेकिन अन्ना ने अपने काम से सबका भरोसा जीत लिया.

अपने करियर में अन्ना राजम मल्होत्रा ने कई अहम जिम्मेदारी निभाईं. वे सात तमिलनाडु मुख्यमंत्रियों और दो प्रधानमंत्रियों के साथ काम कर चुकी थीं. मुंबई के पास बने न्हावा शेवा पोर्ट के विकास में उनकी बड़ी भूमिका रही. वे इस पोर्ट ट्रस्ट की चेयरपर्सन रहीं और इसे आधुनिक रूप देने में योगदान दिया. 1982 में दिल्ली में हुए एशियन गेम्स के आयोजन में भी उन्होंने महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाई.  

पद्म भूषण से सम्मान

अन्ना के काम को देश ने पहचाना. साल 1989 में उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. यह सम्मान उनके शानदार प्रशासनिक जीवन की पहचान बना.

उस समय कितनी थी सैलरी?

आज आईएएस अधिकारियों की सैलरी लाखों में है, लेकिन अन्ना के समय हालात अलग थे. 1949-50 के आसपास एक नए आईएएस अधिकारी की शुरुआती सैलरी लगभग 350 रुपये प्रति माह थी. उस समय यह एक सम्मानजनक वेतन माना जाता था.

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