उत्तर प्रदेश में विशेष तौर पर चुनावी साल में राजनीतिक पार्टियों अपने एजेंडे के तहत लोगों के बीच सक्रिय नजर आते हैं. और इन एजेंडे के पीछे देश की चर्चित हस्तियों के नाम का भी सहारा लिया जाता हैं.
उत्तर प्रदेश में अगले साल चुनाव है इससे पहले कांशीराम को लेकर भी खूब चर्चाएं हैं और सवाल इस बात का की क्या कांशीराम की विचारधारा किसी एक राजनीतिक दल तक ही सीमित है. और इसीलिए चुनावी साल में उनकी विचारधारा पर कब्जे की कोशिश की जाएगी.
सभी राजनीतिक दलों ने लिया है लाभ
इन सवालों का जवाब देते हुए महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के राजनीतिक विज्ञान के प्रो. मोहम्मद आरिफ ने कहा कि इसमें कोई दो राय नहीं कि हमारे मजबूत राजनीतिक व्यक्तित्व ने अपनी क्षमता को समय-समय पर पूरी तरह साबित किया है , लेकिन वर्तमान समय में उनके सिद्धांतों पर चलने की आवश्यकता है ना कि एक सीमित दायरा में उनके विचारधारा को समेटने की.
उन्होंने कहा कि कोई भी राजनीतिक दल हो, सभी ने इसका लाभ लेने का प्रयास करते हैं. चाहे नाम पं. दीनदयाल उपाध्याय का हो या बाबा साहब अंबेडकर अथवा कांशीराम का हो. एक निर्धारित वर्ग तक ही वह सीमित रहे ऐसा कहना उनके ऊंचे राजनीतिक व्यक्तित्व का भी अपमान है.
उन्होंने आगे बताया कि उनकी हुंकार एक क्षेत्र से शुरू होकर राष्ट्र के शीर्ष नेतृत्व तक देखी गई है. इसलिए उनकी विचारधारा पर कब्जा कर पाना पूरी तरह संभव नहीं है. उत्तर प्रदेश की राजनीति में अब चुनावी मुद्दे साल दर साल बदलते देखे गए हैं और इसीलिए आने वाले चुनावी दौर में यह विषय ज्यादा प्रभावी नहीं होंगे.
चुनावी साल में कब्जे की कोशिश
उत्तर प्रदेश चुनाव नजदीक आते ही राजनीतिक दलों की सक्रियता इस बात को लेकर खासतौर पर तेज हो जाती है. कांग्रेस पार्टी बहुजन समाज पार्टी समाजवादी पार्टी और भारतीय जनता पार्टी ने अभी से ही उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव को लेकर तैयारी शुरू कर दी है. ऐसे में अब देखना होगा कि उत्तर प्रदेश की जनता इन राजनीतिक दलों के दावों पर कितना भरोसा करती है.
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