उत्तर प्रदेश के बाराबंकी जिले के तेंदोला गांव निवासी अरुण कुमार वर्मा की कहानी किसी फिल्मी त्रासदी से कम नहीं है. शाहजहांपुर में माली का काम कर किसी तरह अपने परिवार का गुजर-बसर करने वाले अरुण इस समय गहरी परेशानियों से जूझ रहे हैं. उनके जीवन में एक साथ कई संकट खड़े हो गए हैं, जिनका सामना करना उनके लिए बेहद कठिन हो गया है.
पिता को कैंसर, तो मां ब्रेन हेमरेज से बिस्तर पर
अरुण के पिता कैंसर जैसी गंभीर बीमारी से जंग लड़ रहे हैं, जबकि उनकी मां ब्रेन हेमरेज के कारण लंबे समय से बिस्तर पर हैं. घर में दो जवान बेटियां भी हैं, जिनकी जिम्मेदारी भी अरुण के कंधों पर ही है. आर्थिक तंगी के बीच परिवार का इलाज और रोजमर्रा की जरूरतें पूरी करना उनके लिए एक बड़ी चुनौती बन गया है.
स्थिति और भी गंभीर तब हो गई जब उनके घर का गैस सिलेंडर खत्म हो गया और कई दिनों तक नया सिलेंडर नहीं मिल सका. मजबूरी में परिवार को लकड़ियों के चूल्हे पर खाना बनाना पड़ रहा है, जिससे उठने वाला धुआं बीमार माता-पिता की सेहत के लिए और ज्यादा खतरनाक साबित हो सकता है. इसी मजबूरी ने अरुण को रात के सन्नाटे में घर से निकलकर गैस एजेंसी के बाहर लंबी कतार में बैठने पर मजबूर कर दिया.
गैस एजेंसी के बाहर लगी कतारें प्रशासन पर सवाल खड़ा करती हैं
यह घटना कई गंभीर सवाल खड़े करती है. क्या उज्ज्वला योजना और डिजिटल इंडिया के दौर में भी एक आम आदमी को बुनियादी सुविधाओं के लिए इस तरह संघर्ष करना पड़ेगा? गैस एजेंसी के बाहर लगी लंबी कतारें केवल सिलेंडर पाने की कोशिश नहीं हैं, बल्कि उस व्यवस्था की सच्चाई को उजागर करती हैं, जहां गरीब अपने हक के लिए भी जूझते नजर आते हैं.
अरुण कुमार वर्मा जैसे लोग भले ही सिस्टम के लिए एक आंकड़ा हों, लेकिन अपने परिवार के लिए वे पूरी दुनिया हैं. अब यह देखना बाकी है कि प्रशासन और संबंधित एजेंसियां कब जागती हैं और क्या अरुण अपने परिवार के लिए राहत लेकर घर लौट पाते हैं या नहीं.