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Rajasthan News: पेड़ के नीचे पढ़ाई कर पहनी पुलिस की वर्दी…सिरोही की बेटी कांता कुमारी महिला दिवस पर बनी प्रेरणा

सिरोही जिला आदिवासी बाहुल्य क्षेत्र है, जहां आज भी शिक्षा, चिकित्सा और बुनियादी सुविधाओं के लिए लोगों को संघर्ष करना पड़ता है. ऐसे कठिन हालात के बीच यदि कोई बेटी मेहनत और दृढ़ संकल्प के दम पर सफलता हासिल करती है, तो वह केवल अपने परिवार ही नहीं बल्कि पूरे समाज के लिए प्रेरणा बन जाती है. अंतरराष्ट्रीय महिला दिवस के अवसर पर सिरोही जिले की ऐसी ही बेटियों की कहानी सामने आती है, जिन्होंने सीमित संसाधनों और कठिन परिस्थितियों के बावजूद अपने सपनों को सच कर दिखाया. 

सिरोही जिले के आबूरोड और आसपास के आदिवासी क्षेत्रों की करीब दो दर्जन से अधिक गरासिया समाज की बालिकाओं ने संघर्ष करते हुए राजस्थान पुलिस में अपनी जगह बनाई है. इनमें महिला कॉन्स्टेबल कांता कुमारी का नाम विशेष रूप से प्रेरणादायक है, जो वर्तमान में सिरोही कोतवाली थाने में पदस्थापित हैं. कांता कुमारी का जन्म आबूरोड तहसील के दूरस्थ आदिवासी गांव मीन जांबूड़ी में हुआ. उनके पिता रमाजी एक साधारण किसान हैं, जो मौसमी खेती के सहारे परिवार का गुजारा करते हैं. 

गांव में स्कूल ना होने से पेड़ के नीचे बैठकर की पढ़ाई

पहाड़ियों के बीच लगभग 40–45 किलोमीटर दूर बसे इस गांव में लंबे समय तक मूलभूत सुविधाओं का अभाव रहा. कांता बताती हैं कि गांव में स्कूल भवन तक नहीं था और उन्होंने पहली से पांचवीं कक्षा तक की पढ़ाई आम के पेड़ के नीचे बैठकर की, जहां एक महिला पैराटीचर ही सभी बच्चों को पढ़ाती थीं. छठी कक्षा के बाद परिस्थितियों के कारण उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ी और घर की जिम्मेदारी संभालते हुए बकरियां चराने लगीं. साल 2004-05 में एक सामाजिक संस्था ‘दूसरा दशक परियोजना’ के कार्यकर्ता गांव पहुंचे और उन्होंने कांता को आबूरोड में आयोजित चार माह के आवासीय शिविर में पढ़ाई के लिए शामिल कराया. यहीं से उनके जीवन को नई दिशा मिली.

पढ़ाई के साथ उन्होंने आत्मविश्वास, अनुशासन और जीवन के कई महत्वपूर्ण मूल्य सीखे. परिवार की आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी, इसलिए कई बार पढ़ाई जारी रखने के लिए उन्हें मजदूरी और रोजगार गारंटी योजना में भी काम करना पड़ा. उनकी मां ने बेटी की पढ़ाई के लिए अपने गहने गिरवी रख दिए और घर का अनाज तक बेच दिया. कांता बताती हैं कि आज भी उनके गांव में वे सबसे अधिक शिक्षित हैं और उन्होंने एमए तथा बीएड तक की पढ़ाई पूरी की है. 

पढ़ाई के दौरान उन्हें समाज के ताने भी सुनने पड़े. गांव के लोग कहते थे कि आज तक किसी लड़की ने पढ़ाई नहीं की, कांता पढ़कर क्या कर लेगी. कुछ लोग यह भी कहते थे कि लड़की को बाहर पढ़ने भेजोगे तो वह भाग जाएगी. हालांकि उनके पिता ने हमेशा उनका साथ दिया, लेकिन बड़ा भाई चाहता था कि वह पढ़ाई छोड़कर मजदूरी करें, जिस कारण कई बार घर में विवाद भी हुआ. 

साल 2017 में राजस्थान पुलिस में कॉन्स्टेबल पद पर हुई चयनित

कांता मुस्कुराते हुए बताती हैं कि भाई ने एक बार मजाक में कहा था कि तेरी शादी में दहेज के रूप में किताबें दूंगा, जिस पर उन्होंने जवाब दिया कि मुझे दहेज नहीं चाहिए, अगर किताबें दोगे तो खुशी से स्वीकार करूंगी. कांता को पुलिस सेवा में आने की प्रेरणा हेड कॉन्स्टेबल सुमन राठौड़ को देखकर मिली. शिक्षक बनने की तैयारी के दौरान उन्होंने पहली बार पुलिस भर्ती परीक्षा दी और साल 2017 में राजस्थान पुलिस में कॉन्स्टेबल पद पर चयनित हो गईं.

 उनके जीवन का एक यादगार क्षण वह भी रहा जब साल 2007 में ‘दूसरा दशक परियोजना’ के तहत उन्हें भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम से मिलने का अवसर मिला, जिसने उनके जीवन में आगे बढ़ने की प्रेरणा को और मजबूत किया. आज वही लोग जो कभी ताने मारते थे, गर्व से कहते हैं कि यह हमारे गांव की बेटी है जो पुलिस में सेवा दे रही है. 

कांता ने पुलिस सेवा में स्थान हासिल कर समाज में पेश की नई मिसाल

कांता कहती हैं कि उनके जीवन में आज भी कई पारिवारिक चुनौतियां हैं, लेकिन उन्होंने कभी हार नहीं मानी और उनका मानना है कि इंसान को हमेशा संघर्षशील रहना चाहिए. यह कहानी केवल कांता कुमारी की ही नहीं है, बल्कि सिरोही जिले के आबूरोड और पिंडवाड़ा क्षेत्र की कई आदिवासी बेटियों की है, जिन्होंने पुलिस सेवा में स्थान हासिल कर समाज में नई मिसाल पेश की है. 

इनमें हेड कॉन्स्टेबल सुमन राठौड़, पिंडवाड़ा थाने में तैनात केली कुमारी सहित कई बालिकाएं शामिल हैं, जो आज गरासिया समाज की बेटियों के लिए प्रेरणा बन चुकी हैं. सीमित संसाधनों, आर्थिक तंगी और सामाजिक चुनौतियों के बावजूद इन बेटियों ने साबित कर दिया कि यदि मन में कुछ करने का दृढ़ संकल्प हो तो कोई भी मंजिल दूर नहीं होती. आज इन बेटियों की सफलता से न केवल उनका परिवार बल्कि पूरा समाज, जिला और प्रदेश गर्व महसूस कर रहा है.

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