देश भर में गहराए कमर्शियल गैस (LPG) संकट का असर अब राजधानी दिल्ली के सबसे ऐतिहासिक और विश्व प्रसिद्ध ‘मोती महल’ रेस्टोरेंट की रसोई तक पहुंच गया है. हालात इतने गंभीर हो गए हैं कि गैस की किल्लत के कारण करीब 40 साल बाद इस आइकोनिक रेस्टोरेंट में कई प्रमुख डिशें गैस की जगह वापस कोयले (चारकोल) की आंच पर पकाई जा रही हैं.
मोती महल सिर्फ एक रेस्टोरेंट नहीं, बल्कि स्वाद का एक ऐतिहासिक केंद्र है. यहाँ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गांधी से लेकर दिग्गज फुटबॉलर लियोनेल मेसी और इंटरनेशनल मास्टर शेफ गॉर्डन रामसे जैसी विश्वस्तरीय हस्तियां भोजन का लुत्फ उठा चुकी हैं.
सिलेंडरों की सप्लाई हुई आधी, स्टोव पड़े हैं खाली
रेस्टोरेंट के मालिक विनोद चड्ढा ने मौजूदा हालातों की जानकारी देते हुए बताया कि गैस की कमी ने उनके कामकाज के तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है. पहले रेस्टोरेंट में हर हफ्ते औसतन 6 कमर्शियल गैस सिलेंडरों की खपत होती थी, लेकिन अब बड़ी मुश्किल से सिर्फ 3 सिलेंडर ही मिल पा रहे हैं. गैस की इस भारी कमी के कारण किचन में लगातार चलने वाले कई गैस स्टोव अब खाली पड़े रहते हैं.
स्वाद से समझौता नहीं, पारंपरिक तरीकों की ओर वापसी
रेस्टोरेंट प्रबंधन ने विदेशी पर्यटकों और ग्राहकों के अनुभव को देखते हुए मेन्यू से किसी डिश को हटाने के बजाय पकाने की विधि में बदलाव किया है:
- चारकोल पर बटर चिकन और दाल मखनी: मोती महल की पहचान माने जाने वाले ‘बटर चिकन’ की ग्रेवी को 32 से 36 घंटे पकाया जाता है, और ‘दाल मखनी’ को करीब 28 घंटे तक धीमी आंच पर रखा जाता है. गैस बचाने के लिए अब इन दोनों सिग्नेचर डिशेज को कोयले की आंच पर पकाया जा रहा है.
- रुमाली रोटी और पापड़ में बदलाव: तंदूरी रोटी और बारबेक्यू तो पहले से कोयले पर बनते थे, लेकिन अब गैस बचाने के लिए ‘रुमाली रोटी’ भी तंदूर में ही बनाई जा रही है. वहीं, गैस पर बनने वाले मसाला पापड़ की जगह अब ग्राहकों को सीधे ‘रोस्टेड मसाला पापड़’ परोसा जा रहा है.
आने वाले 2 महीनों तक संकट बने रहने की आशंका
रेस्टोरेंट प्रबंधन का मानना है कि एलपीजी आपूर्ति की यह समस्या कम से कम अगले दो महीने तक बनी रह सकती है. फिलहाल उनके पास करीब 55 दिनों का गैस स्टॉक बैकअप के रूप में मौजूद है. प्रबंधन को उम्मीद है कि जल्द ही आपूर्ति की स्थिति बेहतर होगी और किचन का कामकाज फिर से सामान्य हो सकेगा.