अगर ये इल्ज़ाम सच हैं तो मामला सिर्फ़ एक ट्रक ड्राइवर की पिटाई का नहीं, बल्कि क़ानून की वर्दी पर उठते उन सवालों का है जिनका जवाब अवाम बरसों से तलाश रही है। कहा जा रहा है कि ट्रक “नो एंट्री” में दाख़िल हुआ, जिसके बाद चालान की कार्रवाई शुरू हुई। ड्राइवर ऑनलाइन चालान भरने की बात कर रहा था, मगर इल्ज़ाम ये हैं कि कुछ पुलिसकर्मी नक़द रकम पर ज़ोर दे रहे थे। जब बात नहीं बनी तो सड़क पर ही ट्रक चालक के साथ मारपीट की गई।
अगर क़ानून का मक़सद सिर्फ़ वसूली बन जाए और डिजिटल इंडिया के दौर में भी ऑनलाइन भुगतान से परहेज़ हो, तो फिर सवाल उठना लाज़िमी है कि आख़िर डर चालान का था या हिसाब किताब कहीं और का?
वर्दी का असली वक़ार इंसाफ़, सब्र और क़ानूनी रवैये में होता है, ना कि सड़क पर ग़ुस्से और दबाव दिखाने में। अवाम पुलिस को अपना मुहाफ़िज़ समझती है, मगर जब वही हाथ इंसाफ़ की जगह ज़ोर आज़माइश पर उतर आएं तो भरोसा ज़ख़्मी हो जाता है।
अगर ड्राइवर ने क़ानून तोड़ा था तो उसके लिए क़ानूनी कार्रवाई मौजूद है, मगर किसी को सड़क पर सज़ा देने का इख़्तियार किसी को नहीं। अब देखना ये होगा कि आला अफ़सरान इस मामले में हक़ीक़त सामने लाते हैं या मामला भीड़ और ख़ामोशी में दफ़्न कर दिया जाएगा।
