News By: Azam Lala
भोपाल को काग़ज़ों में “स्वच्छ शहर” बनाने के लिए हर साल करोड़ों रुपये ख़र्च किए जाते हैं, लेकिन ज़मीनी हक़ीक़त यह है कि शहर के कई इलाक़े गंदगी के ऐसे मंज़र पेश कर रहे हैं मानो सफ़ाई महज़ फ़ाइलों, बैठकों और फोटो सेशन तक महदूद होकर रह गई हो।
करोंद सब्ज़ी मंडी में आज उस वक़्त अफ़रा-तफ़री मच गई जब सड़क किनारे पड़े कूड़े के अंबार में अचानक आग भड़क उठी। शोले इतनी तेज़ी से उठे कि आसपास के दुकानदारों की जान हलक़ में आ गई। हर तरफ़ धुआँ, बदहवासी और दहशत का आलम था। फ़ौरन दमकल को बुलाया गया, जिसने मौके पर पहुंचकर आग पर क़ाबू पाया।
लेकिन असली सवाल आग बुझने के बाद भी धधकता रहा—
अगर सफ़ाई वाक़ई हो रही है, तो ये कूड़े के पहाड़ आख़िर खड़े कहाँ से हो रहे हैं?
और कौन है जो बार-बार इनमें आग लगाकर लोगों की ज़िंदगी को ख़तरे में डाल रहा है?
वार्ड 78: शिकायतें बहुत, कार्रवाई नदारद
मक़ामी लोगों का कहना है कि वार्ड 78 में सफ़ाई व्यवस्था अल्फ़ाज़ में मौजूद है, अमल में नहीं। इल्ज़ाम है कि ज़िम्मेदार दरोगा साहब का रुतबा ऐसा है कि फ़ोन उठाना भी शायद उनकी शान के ख़िलाफ़ समझा जाता है। और अगर कभी फ़ोन उठ भी जाए, तो जवाब वही पुराना—“देखते हैं, करवा देंगे।” मगर सफ़ाई कर्मचारी नज़र नहीं आते।
ज़ोन 17 के हालात ऐसे हैं मानो इसे ख़िदमत के लिए नहीं, आराम के लिए वक़्फ़ कर दिया गया हो। नालियाँ कूड़े से अटी पड़ी हैं, सड़कों पर गंदगी पसरी है और स्वच्छता अभियान का नामोनिशान दिखाई नहीं देता।
अफ़सरों के हुक्म या गर्मी में उड़ता काग़ज़?
स्थानीय लोगों का तंज़ है कि ज़ोन 17 में बड़े अधिकारियों के आदेशों की हैसियत शायद उतनी ही रह गई है जितनी तपती सड़क पर पड़े काग़ज़ की—हवा चली और उड़ गया।
महापौर और नगर निगम कमिश्नर के आदेशों का असर अगर ज़मीनी स्तर पर दिखाई नहीं देता, तो सवाल सिर्फ़ कर्मचारियों पर नहीं, पूरी प्रशासनिक जवाबदेही पर खड़ा होता है।
बारिश से पहले चेतावनी
बरसात दस्तक देने को है। यदि नालियों की सफ़ाई नहीं हुई, तो गंदा पानी लोगों के घरों में घुसेगा, बीमारियाँ फैलेंगी और फिर वही पुराना सवाल उठेगा—ज़िम्मेदार कौन?
“जब सफ़ाई तस्वीरों में ज़्यादा और सड़कों पर कम दिखाई दे, तो समझ लीजिए कि कूड़ा सिर्फ़ गलियों में नहीं, व्यवस्था में भी जमा हो चुका है।”
