उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षा के नतीजे बीते दिनों जारी किए गए. इस दौरान राज्य भर से कई कहानियां निकलकर आईं उन्हीं में से एक कहानी बुलंदशहर की गायत्री वर्मा की भी है. गायत्री के पिता की पंक्चर बनाने की दुकान है. लेकिन बेटी की सफलता ने पिता को गदगद कर दिया है.
गायत्री के पिता राजकुमार वर्मा एक छोटी सी दुकान पर टायर पंक्चर लगाने का काम करते हैं. रोज की कमाई कोई खास नहीं होती है. मजबूरी में उन्होंने पास ही चाय की छोटी दुकान भी शुरू की, ताकि घर का खर्च और बेटी की पढ़ाई दोनों चल सकें. कई बार ऐसा भी हुआ जब गायत्री की फीस भरने के लिए उन्हें ब्याज पर पैसे उधार लेने पड़े. लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. उनके मन में बस एक ही सपना था बेटी पढ़ेगी, आगे बढ़ेगी.
पढ़ाई का सफर
गायत्री ने इंटरमीडिएट तक की पढ़ाई बुलंदशहर में की. आगे की पढ़ाई के लिए वह अलीगढ़ अपने ननिहाल चली गईं. वहीं रहकर उन्होंने ग्रेजुएशन पूरा किया. आर्थिक तंगी के कारण कोचिंग संभव नहीं थी, इसलिए उन्होंने ऑनलाइन माध्यम से तैयारी की. मोबाइल और इंटरनेट ही उनकी किताबें बन गए. उन्होंने सोशल मीडिया से दूरी बनाई और पूरा समय पढ़ाई को दिया.
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हार से सीख, तीसरे प्रयास में जीत
गायत्री की राह आसान नहीं थी. पहले प्रयास में वह प्रारंभिक परीक्षा भी पास नहीं कर सकीं. मन टूट गया, लेकिन मां के शब्दों ने उन्हें फिर खड़ा कर दिया. दूसरे प्रयास में वह मुख्य परीक्षा तक पहुंचीं, पर अंतिम चयन नहीं हुआ. दो बार की असफलता के बाद भी उन्होंने हार नहीं मानी. तीसरे प्रयास में पूरी ताकत लगा दी. मेहनत रंग लाई और 210वीं रैंक के साथ सफलता उनके कदम चूमने लगी.
घर में जश्न, बेटी की आरती
रिजल्ट आते ही घर का माहौल बदल गया. पड़ोसी, रिश्तेदार, दोस्त सब बधाई देने पहुंच गए. ढोल-नगाड़ों की आवाज गूंजने लगी. फूलों की माला पहनाकर गायत्री का स्वागत हुआ. मां ने बेटी की आरती उतारी. पिता की आंखों में गर्व के आंसू थे.
क्या कहा?
गायत्री कहती हैं कि संसाधन कम हों तो भी सपना छोटा नहीं होना चाहिए. सही दिशा, धैर्य और मेहनत से मंजिल जरूर मिलती है. उन्होंने यह भी बताया कि समय का सही उपयोग और ध्यान भटकाने वाली चीजों से दूरी बहुत जरूरी है. उनके पिता कहते हैं कि मेरी बेटी ईमानदारी से काम करे. न खुद गलत करे, न किसी को करने दे.
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