उत्तर प्रदेश में अलीगढ़ के डोरी नगर निवासी 2023 बैच के आईएएस अधिकारी रिंकू सिंह राही इन दिनों अपने इस्तीफे को लेकर चर्चा में हैं. उन्होंने राष्ट्रपति को भेजे गए अपने त्यागपत्र में प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए हैं. उनका कहना है कि अधिकारी होने के बावजूद उन्हें कोई ठोस जिम्मेदारी नहीं दी जा रही थी, जिससे वह लंबे समय से मानसिक और पेशेगत असमंजस में थे.
अपने विस्तृत त्यागपत्र में रिंकू सिंह राही ने उल्लेख किया कि उन्होंने कई बार उच्चाधिकारियों से कार्यभार देने की मांग की, लेकिन उन्हें लगातार नजरअंदाज किया गया. बिना किसी स्पष्ट जिम्मेदारी के लंबे समय तक संबद्ध रहना न केवल असामान्य है, बल्कि इससे उनके करियर पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ सकता है. उनका दावा है कि इस तरह की स्थिति शायद ही किसी अन्य अधिकारी के साथ देखने को मिली हो.
जानलेवा हमले में बच गये थे
रिंकू सिंह राही का प्रशासनिक सफर भी संघर्षों से भरा रहा है. आईएएस बनने से पहले वह समाज कल्याण विभाग में कार्यरत थे. वर्ष 2009 में मुजफ्फरनगर में तैनाती के दौरान भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने पर उन पर जानलेवा हमला हुआ था. इस हमले में वह गंभीर रूप से घायल हुए और स्थायी रूप से दिव्यांग हो गए. इसके बावजूद उन्होंने हार नहीं मानी और दिव्यांग कोटे से सिविल सेवा परीक्षा पास कर आईएएस बने.
उन्होंने अपने इस्तीफे में यह भी लिखा है कि उन्हें मिलने वाले वेतन और सुविधाओं के मुकाबले वह समाज के लिए अपेक्षित योगदान नहीं दे पा रहे थे, जिससे उनके भीतर एक नैतिक द्वंद्व पैदा हो गया था. उनका कहना है कि जहां भी काम करने का मौका मिलता है, वहां पहले से जड़ें जमा चुकी व्यवस्थाएं ईमानदारी से काम करने में बाधा बनती है.। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि यदि कोई अधिकारी नियमों और संविधान के अनुसार काम करने की कोशिश करता है, तो उसे सीधे हटाने के बजाय बिना जिम्मेदारी के पदों पर डाल दिया जाता है.
रिंकू सिंह राही के परिवार ने भी उनके पक्ष में
रिंकू सिंह के पिता सौदान सिंह का कहना है कि उनके बेटे ने हमेशा ईमानदारी को प्राथमिकता दी और कभी भी किसी प्रकार का समझौता नहीं किया. उन्होंने बताया कि कई बार रिश्वत देने की कोशिशें हुईं, यहां तक कि लोग पैसे लेकर घर तक पहुंचे, लेकिन रिंकू ने हर बार उन्हें ठुकरा दिया. परिवार का मानना है कि इसी ईमानदारी की वजह से उन्हें निशाना बनाया गया और जिम्मेदार पदों से दूर रखा गया.
परिवार के अन्य सदस्यों का भी कहना है कि रिंकू सिंह राही को उनकी क्षमता के अनुसार जिम्मेदारी नहीं दी गई. उनके ताऊ रघुवीर सिंह के अनुसार, यदि उन्हें अन्य अधिकारियों की तरह महत्वपूर्ण पदों पर तैनाती मिलती, तो शायद उन्हें इस्तीफा देने की नौबत नहीं आती. परिवार ने यह भी संकेत दिया कि उनके साथ भेदभाव हुआ है, हालांकि इस पर कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं है.
संघर्षों में पले-बढे रिंकू सिंह
रिंकू सिंह राही का पारिवारिक पृष्ठभूमि भी संघर्षों से भरी रही है. उनके पिता ने आटा चक्की चलाकर बच्चों को पढ़ाया और उन्हें उच्च शिक्षा दिलाई. आज परिवार के कई सदस्य सरकारी सेवाओं में हैं. उनके भाई मूल कुमार राही डिप्टी जेलर के पद पर कार्यरत हैं. इसके बावजूद परिवार आज भी सादगी भरा जीवन जीता है, जो रिंकू सिंह की ईमानदार छवि को और मजबूत करता है.