पश्चिम एशिया में हो रहे युद्ध की वजह से देश भर में एलपीजी का जो संकट पैदा हुआ है, उसका बड़ा असर पिंक सिटी कही जाने वाली राजस्थान की राजधानी जयपुर में भी देखने को मिल रहा है. जयपुर के सांगानेर इंडस्ट्रियल इलाके में संचालित एक हज़ार से ज्यादा टेक्सटाइल प्रिंटिंग फैक्टरियों में तकरीबन नब्बे फीसदी इन दिनों एलपीजी के कामर्शियल सिलेंडर्स नहीं मिलने की वजह से बंद पड़ी हुई हैं. प्रोडक्शन पूरी तरह ठप है. कारोबारियों को हर रोज लाखों का नुकसान हो रहा है तो यहां काम करने वाले मजदूर खाली हाथ बैठे हुए हैं. कोरोना के बाद मजदूरों के सामने अब दूसरी बार पलायन की नौबत शुरू होने को है.
टेक्सटाइल प्रिंटिंग की यह एक हज़ार से ज्यादा फैक्ट्रियां जयपुर के जिस सांगानेर इलाके में संचालित होती हैं, वह सूबे के मुख्यमंत्री भजनलाल शर्मा के चुनाव क्षेत्र में आती हैं. कारोबारी और मजदूर अब सीएम भजनलाल शर्मा से कामर्शियल सिलेंडर मुहैया कराने की गुहार लगा रहे हैं.
फैक्ट्री संचालको ने मजदूरों को दो दिनों में हालात सामान्य नहीं होने पर घर वापस जाने का फरमान सुना दिया है. इस फरमान के बाद मजदूर मायूसी की हालत में है. उन पर दोहरा बोझ पड़ने की आशंका है. उन्हें कुछ दिनों के लिए बेरोजगार होना पड़ेगा तो वहीं दूसरी तरफ घर आने जाने पर हजारों रुपए अलग से खर्च करने होंगे. एलपीजी संकट की वजह से यहां रोजाना तकरीबन 12 से 15 लाख मीटर कपड़ों की छपाई का काम नहीं हो पा रहा है.

जयपुर की सांगानेर इंडस्ट्रियल एरिया में टेक्सटाइल प्रिंटिंग की एक हज़ार से ज्यादा छोटी बड़ी फैक्ट्रियां चलती हैं. ये सभी फैक्ट्रियां पूरी तरह कामर्शियल LPG पर निर्भर होती हैं. दरअसल प्रिंटिंग के बाद कपड़ों को सुखाने वाला ड्रायर या तो एलपीजी से चलता है या फिर इलेक्ट्रिक बॉयलर से. इलेक्ट्रिक बॉयलर दस फ़ीसदी फैक्ट्रियों में भी नहीं लगा है. इक्का दुक्का छोड़कर तकरीबन सभी प्रिंटिंग फैक्ट्रियों के ड्रायर एलपीजी से ही चलते हैं.
हर फैक्ट्री में रोजाना 45 किलो एलपीजी वाले दस से बीस कामर्शियल गैस सिलेंडर्स की जरूरत होती है. कपड़ों को सुखाने के साथ ही प्रिंट किए हुए कपड़ों के कलर को पक्का करने और उन्हें कटिंग के लिए तैयार करने की मशीनें भी एलपीजी से ही चलती हैं.

यहां संचालित होने वाली किसी फैक्ट्री के पास तीन दिन का स्टॉक था तो किसी के पास चार दिनों का. एलपीजी संकट शुरू होने के बाद कोई फैक्ट्री दस दिनों से बंद पड़ी हुई है तो कोई 12 और 15 दिनों से. फैक्ट्री बंद होने से यहां काम करने वाले मजदूर और दूसरे कर्मचारी खाली हाथ बैठे हुए हैं. फैक्ट्री संचालकों ने मजदूरों को यह बता दिया है कि अगर दो दिनों में गैस सप्लाई के हालात सामान्य नहीं हुए तो वह उनका खर्च नहीं उठा पाएंगे और उन्हें अपने घर वापस जाना होगा.
फैक्ट्री संचालकों के इस फरमान के बाद मजदूरो में मायूसी है. ज्यादातर मजदूर की बंगाल और बिहार से आकर यहां काम करते हैं. उनके सामने अब एक बार फिर से पलायन की नौबत पैदा हो गई है. हालात को देखते हुए मजदूरों ने अपना सामान पैक कर लिया है. ट्रेन और बसों में टिकट तलाशे जा रहे हैं.
मजदूरों का कहना है कि शादी ब्याह के इस सीजन में उन्हें ज्यादा पैसों की जरूरत थी लेकिन अब उन पर दोहरी मार पड़ने जा रही हैं. मजदूरों का खाना भी अब रसोई गैस के बजाय लकड़ी पर बन रही है. मजदूरों के सामने रोजगार छिनने और पलायन का खतरा है तो वही संचालकों को इस बात का डर सता रहा है कि अगर युद्ध लंबा खिंचा और एलपीजी का संकट खत्म नहीं हुआ तो फिर क्या होगा.

सांगानेर में आम तौर पर रोज़ाना 12 से 15 लाख मीटर कपड़ा प्रिंट होता था, लेकिन LPG नहीं मिलने के कारण फिलहाल सिर्फ एक लाख मीटर कपड़ा ही प्रिंट हो पा रहा है. फैक्ट्रियों की फ्लैट-बेल्ट प्रिंटिंग मशीनें LPG के बिना चल ही नहीं सकती. कपड़ा ड्राई करने के लिए भी सिलेंडर की जरूरत होती है. गैस न मिलने से मशीनें बंद पड़ी हैं. गीता टैक्सटाइल्स की संचालक दीपा खुशलानी के मुताबिक कोरोना के बाद यह दूसरा मौका है, जब प्रोडक्शन पूरी तरह ठप है. दीपा ने इस बारे में सीएम भजनलाल शर्मा से कुछ राहत दिए जाने की गुहार लगाई है.
पश्चिम एशिया में इज़राइल–ईरान–अमेरिका के बीच बढ़ते तनाव ने LPG सप्लाई चेन को बुरी तरह प्रभावित किया है. आयात कम हुआ है और इसकी सीधी मार अब सांगानेर जैसे बड़े उद्योगों पर पड़ रही है. कारोबारी प्रशासन से लगातार सप्लाई बहाल करने की अपील कर रहे हैं, लेकिन अब तक स्थिति में कोई सुधार नहीं हुआ है. उद्योग को रोज़ करोड़ों का नुकसान होने का अंदेशा है.