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दिल्ली में फिर शुरू हुई ‘फूल वालों की सैर’, सीएम रेखा गुप्ता बोलीं- ये भाईचारे की मिसाल

फूल वालों की सैर एक बार फिर दिल्ली में शुरू हो गया है. दिल्ली सचिवालय में शहनाई की धुनों के बीच इस ऐतिहासिक उत्सव की शुरुआत की गई. इस मौके पर सीएम रेखा गुप्ता समेत कई मंत्री और सामाजिक संगठनों के लोग मौजूद रहे. मुख्यमंत्री ने कहा कि फूल वालों की सैर सिर्फ एक त्योहार नहीं है, बल्कि यह दिल्ली की साझा संस्कृति और भाईचारे की मिसाल है. उन्होंने कहा कि यह परंपरा हमें याद दिलाती है कि अलग-अलग धर्म और समुदाय के लोग मिलकर भी त्योहार मना सकते हैं.

जानकारी के अनुसार, यह उत्सव करीब एक हफ्ते तक चलता है. इसमें हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर पूजा और चादर चढ़ाने की परंपरा निभाते हैं. मेहरौली स्थित ख्वाजा बख्तियार काकी की दरगाह पर फूलों की चादर और पंखा चढ़ाया जाता है. इसके बाद फूलों का पंखा और छत्र मेहरौली के प्राचीन योगमाया मंदिर में भी अर्पित किया जाता है.

संस्था के सदस्यों ने भेंट किया फूलों का पंखा

सोमवार को कार्यक्रम में आयोजक संस्था अंजुमन सैर-ए-गुल फरोशां के सदस्यों ने मुख्यमंत्री का पारंपरिक तरीके से स्वागत किया. उन्हें फूलों का पंखा भेंट किया गया, जो इस मेले की पुरानी परंपरा का हिस्सा है. आयोजकों ने बताया कि यह त्योहार आमतौर पर नवंबर में मनाया जाता है, लेकिन पिछले साल यह कार्यक्रम नहीं हो पाया था. दरअसल, मेहरौली के आम बाग में आयोजन की अनुमति नहीं मिली थी. बाद में प्रशासन के हस्तक्षेप के बाद इस बार कार्यक्रम की अनुमति मिल गई और उत्सव फिर से शुरू हो सका.

कई दशक पहले हुई थी फूल वालों की सैर की शुरुआत

इतिहासकार बताते हैं कि फूल वालों की सैर की शुरुआत कई दशक पहले हुई थी. माना जाता है कि इसकी शुरुआत मुगल दौर में हुई थी. उस समय लोगों ने एक मन्नत पूरी होने पर फूलों का पंखा बनाकर दरगाह और मंदिर दोनों जगह चढ़ाने की परंपरा शुरू की थी. धीरे-धीरे यह परंपरा एक बड़े मेले में बदल गई. इसमें फूलों से सजे पंखे, झांकियां, संगीत, नृत्य और सांस्कृतिक कार्यक्रम होते हैं. दिल्ली और आसपास के लोग बड़ी संख्या में इसमें हिस्सा लेते हैं.

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हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर मनाते हैं उत्सव

इस मेले की सबसे खास बात यह है कि इसमें धर्म की कोई दीवार नहीं होती. हिंदू और मुस्लिम समुदाय के लोग मिलकर इस उत्सव को मनाते हैं. इसी वजह से इसे दिल्ली की गंगा-जमुनी तहजीब की पहचान माना जाता है. आज भी यह परंपरा लोगों को आपसी प्यार, भाईचारे और एकता का संदेश देती है. यही कारण है कि दिल्ली के लोग हर साल इस उत्सव का इंतजार करते हैं और बड़ी खुशी से इसमें शामिल होते हैं.

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