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Delhi News: फ्रोजन एम्ब्रियो को लेकर पति-पत्नी में कानूनी जंग, 16 भ्रूणों के लिए हाईकोर्ट पहुंची महिला

मुंबई की एक महिला ने अपने अलग रह रहे पति के साथ चल रहे विवाद के बीच जमे हुए भ्रूणों (फ्रोजन एम्ब्रियो) के अधिकार को लेकर अब दिल्ली हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. बताया जा रहा है कि महिला के पास कुल 16 भ्रूण संरक्षित हैं, जिनके इस्तेमाल को लेकर पति-पत्नी के बीच विवाद चल रहा है. इससे पहले राष्ट्रीय सहायक प्रजनन प्रौद्योगिकी (ART) और सरोगेसी बोर्ड ने उसकी इस अपील को खारिज कर दिया था.

46 साल की यह महिला पहले बॉम्बे हाई कोर्ट में भी गई थी, लेकिन सितंबर 2025 में उसने अपनी याचिका वापस ले ली थी ताकि वह दिल्ली में संबंधित बोर्ड से अपील कर सके. मगर महिला का आरोप है कि उसकी अपील को सही तरह से सुने बिना खारिज कर दिया गया. इसके बाद उसने दिल्ली हाई कोर्ट का रुख अपनाया है.

पती ने ART कानून के तहत फर्टिलिटी ट्रांसफर को रोका

यह मामला साल 2022 से जुड़ा है, जब दक्षिण मुंबई के इस दंपति ने शादी के एक साल बाद एक फर्टिलिटी क्लिनिक में महिला के अंडाणु और पुरुष के शुक्राणु से बने भ्रूणों को फ्रीज करवा दिया था. लेकिन लगभग एक साल बाद दोनों के कहा सुनी होने लगी, जिसके बाद से वे अलग रहने लगे, हालांकि दोनों पति-पत्नी ने अभी तलाक नहीं लिया है.

महिला की इच्छा है कि इन भ्रूणों को किसी दूसरे फर्टिलिटी क्लिनिक में ट्रांसफर किया जाए ताकि वे बाद में मां बन सके. लेकिन ART कानून के तहत महिला के पति ने इस प्रक्रिया को रोक दिया. दरअसल,  इस तरह के ट्रांसफर के लिए दोनों पति-पत्नी की सहमति चाहिए होती है. 

महिला ने अदालत से मांगी भ्रूणों को स्थानांतरित की अनुमति

महिला ने याचिका देते हुए कहा कि उसने ART एक्ट की धारा 29 के तहत भ्रूणों को स्थानांतरित करने की अनुमति मांगी है और अदालत से अनुरोध किया है कि उसे पति की सहमति के बिना इसकी अनुमति दी जाए. महिला का कहना है कि उनका वैवाहिक संबंध पूरी तरह टूट चुका है, जिस कारण पति इसकी सहमति नहीं दे रहे हैं. महिला की ओर से दाखिल याचिका में यह भी कहा गया है कि पति के व्यवहार के कारण उनसे मां बनने का हक छिना जा रहा है. महिला ने आरोप लगाया कि उसका पति उसे प्रताड़ित करता था और बाद में उसे छोड़ दिया.

याचिका में यह भी बताया है कि एक ओर तो वह एक ऐसी शादीशुदा महिला है, जिसके पति ने उसे छोड़ दिया है. वहीं दूसरी ओर उसके अपने ही संरक्षित भ्रूणों का इस्तेमाल नहीं करने दिया जा रहा. इसके अलावा मुस्लिम पर्सनल लॉ के तहत सहायक प्रजनन तकनीक (IVF) का उपयोग केवल वैवाहिक संबंध के रहते हुए ही संभव माना जाता है. ऐसे में तलाक होने के बाद यह प्रक्रिया संभव नहीं मानी जाएगी.

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