दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) कैंपस में धरना-प्रदर्शन और सार्वजनिक बैठकों पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर मामला अब अदालत पहुंच गया है. दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले में दिल्ली पुलिस, दिल्ली विश्वविद्यालय प्रशासन और कुछ कॉलेजों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. अदालत ने साफ किया है कि सभी पक्ष तय समय में अपना जवाब दाखिल करें. इस मामले की अगली सुनवाई 25 मार्च को होगी.
17 फरवरी के आदेश को दी गई चुनौती
दरअसल, 17 फरवरी को दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रॉक्टर की ओर से एक आदेश जारी किया गया था. इस आदेश में एक महीने के लिए विश्वविद्यालय परिसर में किसी भी तरह की सार्वजनिक बैठक, रैली, जुलूस, धरना और विरोध-प्रदर्शन पर रोक लगा दी गई थी.
छात्रों का कहना है कि यह आदेश उनके लोकतांत्रिक अधिकारों का उल्लंघन करता है. इसी को चुनौती देते हुए एक छात्र ने दिल्ली हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की है. याचिका में कहा गया है कि छात्रों को शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखने का अधिकार है और इस तरह का पूर्ण प्रतिबंध उचित नहीं है.
पुलिस ने धारा 144 लागू होने का दिया हवाला
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि सिविल लाइंस सब-डिवीजन की पुलिस ने इलाके में पहले से ही धारा 144 लागू कर रखी है. इसे अप्रैल तक बढ़ा दिया गया है.
दिल्ली पुलिस की ओर से अदालत में कहा गया कि उन्हें खुफिया जानकारी मिली थी कि दो छात्र समूहों के बीच टकराव की संभावना है. पहले भी एक मामले में पुलिस स्टेशन का घेराव किया गया था. ऐसे में कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए एहतियात के तौर पर धारा 144 लागू की गई.
याचिकाकर्ता के वकील ने अदालत को बताया कि इस आदेश का असर छात्रों की सामान्य गतिविधियों पर भी पड़ रहा है. उनका कहना है कि कैंपस में छात्र सामान्य तरीके से भी एक जगह इकट्ठा नहीं हो पा रहे हैं.
यहां तक कि चाय या खाने के स्टॉल के पास खड़े होने में भी दिक्कत हो रही है. छात्रों का तर्क है कि ऐसा माहौल विश्वविद्यालय की सामान्य गतिविधियों को प्रभावित कर रहा है.
कोर्ट ने फैसले पर जताई नाराजगी
मामले की सुनवाई के दौरान दिल्ली हाईकोर्ट ने विश्वविद्यालय के फैसले पर सवाल भी उठाए. अदालत ने कहा कि कानून-व्यवस्था बनाए रखना पुलिस की जिम्मेदारी है, लेकिन हर तरह की बैठक और सभा पर पूरी तरह रोक लगाना उचित नहीं लगता.
कोर्ट ने यह भी कहा कि अगर कोई हिंसा करता है तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है, लेकिन शांतिपूर्ण बैठकों पर रोक लगाना संविधान के तहत मिले अभिव्यक्ति और सभा के अधिकारों का उल्लंघन हो सकता है.
अदालत ने सभी पक्षों को अपना जवाब दाखिल करने का निर्देश दिया है और स्पष्ट किया है कि इस मामले में अतिरिक्त समय नहीं दिया जाएगा. अब सभी की नजरें 25 मार्च को होने वाली अगली सुनवाई पर टिकी हैं.