राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू के पश्चिम बंगाल दौरे के दौरान स्वागत प्रोटोकॉल को लेकर उठे विवाद ने राजनीति में भी बहस तेज कर दी है. इस मामले पर अब महाराष्ट्र की विपक्षी पार्टी ने भी बीजेपी पर निशाना साधा है.
बता दें कि आरोप लगाया गया कि मुख्यमंत्री ममता बनर्जी राष्ट्रपति के स्वागत के लिए नहीं पहुंचीं, जिसके बाद बीजेपी ने इसे राष्ट्रपति का अपमान बताया. इस पूरे मुद्दे पर अब विपक्ष ने बीजेपी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर तीखा हमला बोला है.
इसका राजनीतिक फायदा ममता बनर्जी को ही मिल सकता है- संपादकीय
संपादकीय के अनुसार, राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू जब पश्चिम बंगाल के दौरे पर पहुंचीं, तब मुख्यमंत्री ममता बनर्जी एयरपोर्ट पर उनके स्वागत के लिए मौजूद नहीं थीं. इसके बाद प्रधानमंत्री मोदी ने यह प्रचार शुरू कर दिया है कि यह भारत के राष्ट्रपति का अपमान है.
अगर BJP पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनावों में राष्ट्रपति के अपमान को चुनावी मुद्दा बना रही है, तो ममता बनर्जी की शानदार जीत निश्चित है. संपादकीय में कहा गया कि जनहित के मुद्दों की कमी के कारण इस विषय को राजनीतिक रंग दिया जा रहा है.
ममता बनर्जी का स्पष्टीकरण से समझना चाहिए- संपादकीय
लेख के अनुसार, ममता बनर्जी का दिया गया स्पष्टीकरण समझ जाना चाहिए कि राष्ट्रपति की यात्रा सरकार को विश्वास में लिए बिना तय की गई थी. ममता बनर्जी के ओर से कहा गया कि जब वे आंदोलन और धरने में उलझे हुए थे, तब राष्ट्रपति कोलकाता हवाई अड्डे पर पहुंचीं. उन्होंने शहर के मेयर को उनके स्वागत के लिए भेजा. इससे ज्यादा और क्या कर सकते थे? अगर राष्ट्रपति पचास बार यहां आएंगी, तो क्या वे हर दिन उनका स्वागत करने जाना चाहिए? ममता बनर्जी का गुस्सा समझा जाना चाहिए.
आदिवासी मुद्दों पर भी उठाए सवाल
संपादकीय में यह भी कहा गया कि बीजेपी ने इस विवाद को आदिवासी महिला के सम्मान से जोड़ने की कोशिश की. इसके जवाब में ममता बनर्जी ने मणिपुर में आदिवासी महिलाओं के साथ हुई घटनाओं और आदिवासी अधिकारों के मुद्दों का उल्लेख किया.
लेख में आरोप लगाया गया कि मणिपुर में आदिवासी महिलाओं को निर्वस्त्र किए जाने पर राष्ट्रपति चुप क्यों रहीं? आदिवासी क्षेत्रों में जल, जंगल और जमीन से जुड़े अधिकारों के उल्लंघन के मामलों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया. इसी संदर्भ में यह सवाल उठाया गया कि ऐसे मामलों पर राष्ट्रीय स्तर पर पर्याप्त प्रतिक्रिया क्यों नहीं दिखी. तब राष्ट्रपति चुप क्यों रहीं?
पहले भी उठ चुके हैं प्रोटोकॉल के मुद्दे
संपादकीय में यह भी उल्लेख किया गया कि पहले भी कई अवसरों पर प्रोटोकॉल को लेकर विवाद सामने आए हैं. उदाहरण के तौर पर हरियाणा में एक कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री की अनुपस्थिति का मामला उठाया गया. इसके अलावा 28 मई 2023 को नए संसद भवन के उद्घाटन समारोह में राष्ट्रपति को आमंत्रित नहीं किए जाने और अयोध्या में राम मंदिर उद्घाटन कार्यक्रम में भी उन्हें न बुलाने को लेकर सवाल उठाए गए.
राष्ट्रपति पद की गरिमा पर बहस
लेख में कहा गया कि राष्ट्रपति पद देश का सर्वोच्च संवैधानिक पद है और इसे राजनीतिक विवादों में नहीं घसीटना चाहिए. इतिहास में डॉ. राजेंद्र प्रसाद, डॉ. ए.पी.जे. अब्दुल कलाम और प्रणव मुखर्जी जैसे राष्ट्रपतियों का उदाहरण देते हुए इस पद की गरिमा और भूमिका को रेखांकित किया गया.
संपादकीय में यह भी कहा गया कि राष्ट्रपति भवन की प्रतिष्ठा और संवैधानिक पदों की गरिमा को बनाए रखना सभी राजनीतिक दलों की जिम्मेदारी है. पश्चिम बंगाल की इस घटना ने एक बार फिर इस विषय पर राष्ट्रीय स्तर पर बहस को जन्म दे दिया है.