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‘खामेनेई ने किसी महाशक्ति के सामने घुटने नहीं टेके और…’, सामना में उद्धव गुट ने सुप्रीम लीडर को बताया शहीद

अमेरिका और इजरायल के साझा हमले में मारे गए ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्लाह सैयद अली खामेनेई को शिवसेना (यूबीटी) के मुखपत्र सामना में शहीद बताया गया है. संपादकीय में कहा गया कि खामेनेई ने किसी महाशक्ति के सामने घुटने नहीं टेके और देश छोड़कर नहीं भागे. लेख के अनुसार उन्होंने अपने देश और स्वाभिमान के लिए अंत तक संघर्ष किया. उनकी शहादत को लंबे समय तक याद रखने की बात कही गई है.

लेख में दावा किया गया कि अमेरिका और इजरायल के हमलों के बीच उन्होंने अपने देश के लिए बलिदान दिया, जिसे इतिहास लंबे समय तक याद रखेगा. वहीं अमेरिका और इजरायल पर “झुंडशाही” चलाने का आरोप लगाया गया है. 

ईरान पर परमाणु के नाम पर दबाव बनाया गया- सामना

लेख में कहा गया कि महाशक्तियां तेल, खनिज संपदा और व्यापारिक हितों के लिए अन्य देशों में हस्तक्षेप करती हैं. इसमें बेंजामिन नेतन्याहू और डोनाल्ड ट्रंप पर भी तीखा हमला किया गया है. दावा किया गया कि ईरान पर परमाणु कार्यक्रम के नाम पर दबाव बनाया गया, जबकि अन्य परमाणु संपन्न देशों पर ऐसी कार्रवाई नहीं की गई. लेख में इराक के पूर्व राष्ट्रपति सद्दाम हुसैन और लीबिया के नेता मुअम्मर गद्दाफी का उदाहरण देते हुए कहा गया कि पहले हथियारों का आरोप लगाया गया और बाद में शासन परिवर्तन कराया गया.

इजरायल और अमेरिका के दबाव के कारण भारत चुप है- सामना

लेख में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी अप्रत्यक्ष निशाना साधा गया है. कहा गया कि भारत ने ईरान जैसे पारंपरिक मित्र का साथ संकट के समय मजबूती से नहीं दिया. संपादकीय में आरोप लगाया गया कि इजरायल और अमेरिका के दबाव के कारण भारत चुप है. साथ ही यह भी लिखा गया कि कश्मीर मुद्दे पर ईरान ने भारत का समर्थन किया और सस्ते दामों पर तेल उपलब्ध कराया, लेकिन वर्तमान संकट में भारत की ओर से स्पष्ट समर्थन नहीं दिखा.

सामना के लेख में यह भी दावा किया गया कि खामेनेई ने अपने जीवन में किसी भी “समर्पण” वाले समझौते को स्वीकार नहीं किया. एक प्रसंग का उल्लेख करते हुए लिखा गया कि उन्होंने युवाओं को पहले पढ़ाई और विज्ञान की ओर बढ़ने की सलाह दी, और जरूरत पड़ने पर देश के लिए खड़े होने की बात कही. लेख के अंत में सवाल उठाया गया कि क्या भारत सरकार उनके निधन पर शोक व्यक्त करेगी या अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण मौन रहेगी. इस संपादकीय के प्रकाशित होते ही राजनीतिक हलकों में चर्चा तेज हो गई है.

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