राजस्थान में पंचायत और निकाय चुनाव में हो रही देरी को लेकर राजस्थान हाईकोर्ट ने सख्त रुख अपनाया है. अदालत ने राज्य चुनाव आयोग, राज्य निर्वाचन आयुक्त राजेश्वर सिंह और आयोग सचिव को अवमानना नोटिस जारी करते हुए चार सप्ताह में जवाब तलब किया है. यह कार्रवाई पूर्व विधायक संयम लोढ़ा की ओर से दायर अवमानना याचिका पर सुनवाई के दौरान की गई.
कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश एसपी शर्मा की खंडपीठ ने सुनवाई के दौरान चुनाव आयोग से स्पष्ट पूछा कि हाईकोर्ट द्वारा पहले से तय समय सीमा के बावजूद मतदाता सूचियों के पुनरीक्षण और अंतिम प्रकाशन का कार्यक्रम निर्धारित सीमा से बाहर कैसे जारी कर दिया गया. अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया यह आदेश न्यायालय के पूर्व निर्देशों के विपरीत नजर आता है.
याचिकाकर्ता के वकील ने कोर्ट में क्या कहा?
याचिकाकर्ता की ओर से वकील पुनीत सिंघवी ने कोर्ट को बताया कि राज्य सरकार और चुनाव आयोग जानबूझकर पंचायत और निकाय चुनाव टालने की दिशा में काम कर रहे हैं. उन्होंने दलील दी कि आयोग ने अंतिम मतदाता सूची 22 अप्रैल तक जारी करने का कार्यक्रम तय किया है, जबकि हाईकोर्ट ने स्पष्ट रूप से 15 अप्रैल 2026 तक चुनाव प्रक्रिया पूरी करने के आदेश दिए थे. ऐसे में तय समय सीमा में चुनाव कराना व्यवहारिक रूप से संभव नहीं रह जाता. इसे कोर्ट आदेश की सीधी अवमानना बताया गया.
आयोग से चार सप्ताह में जवाब देने के निर्देश
सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से महाधिवक्ता राजेंद्र प्रसाद ने अदालत को अवगत कराया कि सरकार चुनाव की समय सीमा आगे बढ़ाने के लिए अलग से प्रार्थना पत्र प्रस्तुत करने जा रही है. इस पर कोर्ट ने कड़ी टिप्पणी करते हुए कहा कि यह बाद की स्थिति है, लेकिन फिलहाल सवाल यह है कि जब न्यायालय की समय सीमा स्पष्ट थी तो चुनाव आयोग ने उसके बाहर का कार्यक्रम जारी कैसे किया. अदालत ने इस बिंदु पर आयोग से चार सप्ताह में विस्तृत जवाब देने के निर्देश दिए हैं. हालांकि इस चरण में राज्य सरकार को अलग से नोटिस जारी नहीं किया गया है.
15 अप्रैल 2026 तक पंचायत चुनाव के दिए थे निर्देश
गौरतलब है कि राजस्थान हाईकोर्ट ने 14 नवंबर 2025 को 439 याचिकाओं पर एक साथ फैसला सुनाते हुए राज्य सरकार को 31 दिसंबर 2025 तक परिसीमन प्रक्रिया पूरी करने तथा 15 अप्रैल 2026 तक पंचायत और नगरीय निकाय चुनाव कराने के निर्देश दिए थे. बाद में इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई, जहां शीर्ष अदालत ने भी समयबद्ध चुनाव कराने पर जोर दिया था.
अब हाईकोर्ट की ताजा सख्ती के बाद यह मामला राजनीतिक और प्रशासनिक दोनों स्तर पर बेहद अहम माना जा रहा है. प्रदेश की कई पंचायतों और निकायों में चुनाव की राह पहले ही ओबीसी आरक्षण और परिसीमन प्रक्रिया के कारण उलझी हुई है. ऐसे में अदालत की अगली सुनवाई और चुनाव आयोग के जवाब पर सबकी नजरें टिक गई हैं.